स्मार्टफ़ोन बनाने के मामले में क्या भारत देगा चीन को टक्कर

दो महीने तक काफ़ी सोचने समझने के बाद उन्होंने वन प्लस 10आर को पसंद किया जो उन्हें साढ़े 32 हज़ार के क़रीब पड़ा. स्मार्टफ़ोन के लिहाज से वैसे तो ये एक उचित क़ीमत है. फिर भी ये बड़ी राशि है, ख़ासकर भारत जैसे विकासशील देश में.

वे कहती हैं, “आइडिया एक ऐसा फ़ोन ख़रीदने का था जिसके फ़ीचर्स भी अच्छे हों और जो मेरी जेब पर भारी भी न पड़े.”

आसवानी का ये नया स्मार्टफ़ोन चीन की कंपनी ने भारत में बनाया था- जो आज की तारीख़ में एक आम परिपाटी है. लेकिन 2014 तक भारत में बेचे जाने वाले अधिकांश फ़ोन आयात किए जाते थे. लेकिन हाल के दिनों में ये पूरी तरह से बदल गया है.

इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन के मुताबिक, साल 2022 में देश में बेचे जाने वाले अधिकांश फ़ोन का उत्पादन भारत में ही किया गया था.

वैसे तो उनमें से कई फ़ोन ताइवान के फॉक्सकॉन या दक्षिण कोरियाई सैमसंग जैसी विदेशी कंपनियों के भारत में स्थित कारखानों में बनाए गए. लेकिन घरेलू कंपनियों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है.

माइक्रोमैक्स इन्फॉरमैटिक्स कंपनी उनमें से एक है जो 15 साल पहले, 2008 में मोबाइल हैंडसेट बनाने के बिजनेस में आई थी. महज़ दो सालों में ये भारत की सबसे बड़ी चिप फ़ोन (फ़ीचर फ़ोन) बनाने वाली कंपनी बन गई.

हालांकि इस उछाल के बावजूद माइक्रोमैक्स के सह-संस्थापक राजेश अग्रवाल कहते हैं कि चीन की स्मार्टफ़ोन कंपनियों से मुक़ाबला करना बहुत कठिन है.

जब उनकी कंपनी एक नया फ़ोन लॉन्च करती है तो वे उम्मीद कर सकते हैं कि भारत में उसके कम से कम 10 लाख यूनिट बिकेंगे.

लेकिन चीन की फ़ोन बनाने वाली कंपनी एक करोड़ या उससे भी अधिक फ़ोन बेच सकती है, तो उनके लिए अपने प्रतिद्वंद्वी के मुक़ाबले मोबाइल फ़ोन को कम कीमत पर बेचना कहीं आसान होता है.

वे कहते हैं, “उत्पादन की बड़ी क्षमता उनकी ताक़त है.”

उत्पादन में लगने वाली लगभग हर एक चीज़ चीन की कंपनी स्थानीय स्तर पर सोर्स कर सकती है. भारत मोबाइल के कुछ उपकरणों का उत्पादन करता है, इनमें चार्जर, केबल,

बैटरी शामिल हैं, लेकिन इसके कहीं अधिक जटिल हिस्से जैसे कि स्क्रीन और कंप्यूटर चिप्स विदेशों में ही बनाए जाते हैं. जहां तक उत्पादन का सवाल है- यह तो अभी शुरुआत ही है.

राजेश अग्रवाल कहते हैं, “हमें ख़ुद का किचन बनना होगा जहां हम स्थानीय स्तर पर सभी चीज़ों का उत्पादन करने में सक्षम हो सकें.”

साथ ही वो ये भी कहते हैं कि, “हमारा अंतिम लक्ष्य वो बदलाव लाना होगा जहां हम घरेलू खपत के लिए उत्पादन करने वाले से वैश्विक मांग की पूर्ति कर सकें, और ये न केवल फ़ोन के लिए बल्कि लैपटॉप, टैपलेट और अन्य उपकरणों के लिए भी हो.”

पीआईएल योजना के तहत भारत में बनाए जाने वाले मोबाइल फ़ोन के पुर्जों (यानी मेड इन इंडिया) पर सब्सिडी मिलती है.

इंडियन सेल्युलर ऐंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) के अनुसार, भारत में बनाए जाने वाले मोबाइल फ़ोन के फिलहाल 15% से 20% पुर्जे ही मेड इन इंडिया हैं.

पीआईएल योजना का लक्ष्य इसे 35% से 40% के बीच तक पहुंचाना है. आईसीईए के अध्यक्ष पंकज महिंद्रू कहते हैं, “इलेक्ट्रॉनिक उत्पादकों के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेंटिव योजना गेम चेंजर है.”

वे कहते हैं, “मोबाइल फ़ोन के उत्पादन की दिशा में भारत सबसे तेज़ी से आगे बढ़ता हुआ देश है और ये मोबाइल हैंडसेट उत्पादन के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बन कर उभरा है.”

भारत बनेगा हब?
आईसीईए के मुताबिक, भारत से किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा मोबाइल फ़ोन्स का है और अगले साल इस हिस्सा के 50 फ़ीसद तक पहुंच जाने की संभावना है.

भारत की मोबाइल निर्माता कंपनी लावा इंटरनेशनल के अध्यक्ष हरि ओम राय कहते हैं, “भारत सेल्यूलर फ़ोन उत्पादकों का अगला वैश्विक हब बनेगा.”

वे इशारा करते हैं कि जैसे जैसे चीन में पैसे बढ़ रहे हैं वहां मज़दूरी में भी इजाफ़ा हो रहा है, और इस मामले में अन्य देशों की तुलना में उसे जो लाभ था उसमें कुछ कमी आई है.

साथ ही हरि ओम राय ये भी कहते हैं कि पूरी दुनिया चीन पर बहुत अधिक बढ़ती जा रही निर्भरता से चिंतित है. और झेंगझोउ शहर में एपल के मुख्य सप्लायर फ़र्म में आया अवरोध इन चिंताओं को शायद ही कम कर पाए. ओम राय कहते हैं, “अगर फ़र्म अपनी मैन्यूफ़ैक्चरिंग को कहीं और विस्थापित करना चाहती हैं तो भारत के एक आकर्षक विकल्प है.”

वो कहते हैं, “भारत में दुनिया की 18% आबादी रहती है, और दुनिया के जीडीपी में इसका हिस्सा महज 3.1% है. जैसे जैसे देश की जीडीपी बढ़ेगी, यह दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार बन जाएगा.

दीर्घकालीन क्षमता को देखते हुए, हर कंपनी भारत में खुद को स्थापित करने और अपने प्रतिद्वंद्वी को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर करने की कोशिश कर रही है.”लेकिन मुंबई में इन औद्योगिक नीतियों में दीपा आसवानी की दिलचस्पी बहुत ज़्यादा नहीं है.

वो कहती हैं, “मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मेरा स्मार्टफ़ोन कहां बनता है. एक ग्राहक के रूप में मुझे लगता है कि सारा मामला बजट और फ़ीचर्स का है. स्मार्टफ़ोन ख़रीदार के रूप में मैं उसी देश की ओर देखूंगी जिसके पास एडवांस और सस्ती टेक्नोलॉजी होगी.”

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