E-waste डिस्पोज़ करने में आई परेशानी, तो आया स्टार्टअप आइडिया, अब कचरे से निकाल रहे सोना

E-waste डिस्पोज़ करने में आई परेशानी, तो आया स्टार्टअप आइडिया, अब कचरे से निकाल रहे सोना

एक बड़ी प्रसिद्ध कहावत है ‘चिंता, चिता के समान होती है।’ यानि आप किसी चीज़ के बारे में जरूरत से ज्यादा सोच लें, तो वह आपके लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है। लेकिन यह कहावत इन दोनों भाइयों पर बिल्कुल भी फिट नहीं बैठती। पर्यावरण को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता और जिज्ञासा ने इन दोनों को कुछ नया करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने एक ऐसी प्रीमियम कंपनी खड़ी कर दी, जो वैज्ञानिक तरीके से ई-कचरे का निपटारा कर रही है।

साल 2007 में नितिन और रोहन अपने पुराने लैपटॉप के लिए किसी ऐसे रीसायकलर की तलाश कर रहे थे, जो ई-कचरे को पर्यावरण के अनुकूल डिस्कार्ड करता हो। जब अपने आस-पास ऐसा कोई नहीं मिला, तो उन्होंने गूगल का सहारा लिया। लेकिन उन्हें वहां भी अपनी समस्या का समाधान नज़र नहीं आया। उन्हें लगा कि क्या लैपटॉप जैसे ई-कचरे से निपटने का एकमात्र साधन उन्हें जलाना ही है। वह इसके लिए पर्यावरण के अनुकूल कुछ रास्ते तलाश रहे थे।

जिम्मेदारी से आई ज़िद, ज़िद से मिला बिजनेस आइडिया

नितिन और रोहन गुप्ता, लगातार कुछ महीनों तक रिसर्च करते रहे और जब उन्हें अपने आस-पास या दूर-दूर तक ऐसा कोई रीसायकलर नहीं मिला, तो उन्होंने इसके लिए अपनी खुद की एक प्रीमियम अटेरो रीसायक्लिंग कंपनी खड़ी कर दी। उनकी यह रीसायक्लिंग कंपनी, इलेक्ट्रॉनिक स्क्रैप जैसे टेलीविजन सेट, कंप्यूटर मॉनीटर, प्रिंटर, स्कैनर, कीबोर्ड, माइक, केबल, सर्किट बोर्ड, लैंप, कैलकुलेटर, फोन, आंसरिंग मशीन, डीवीडी जैसे कितने ही प्रॉडक्ट्स को वैज्ञानिक तरीके से रीसायकल कर उनका निपटारा कर रही है।

नितिन ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक की है और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के स्टर्न स्कूल ऑफ बिज़नेस के पूर्व छात्र भी रह चुके हैं। वहीं, रोहन ने आरईसी, जयपुर से केमिकल इंजीनियरिंग में डिग्री ली हुई है। इन दोनों ने अपनी काबिलियत को एक विशेष रीसायक्लिंग प्रक्रिया तैयार करने में लगा दिया।

उनकी यह तकनीक मकैनिकल और हाइड्रो मेट्रोलॉजिकल तकनीक का मिश्रण है, जो बेहद कम कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के साथ, ई-कचरे से 98 प्रतिशत तक धातु निकाल सकती है। इस तकनीक से सोना और चांदी के अलावा तांबा, टिन, एल्यूमीनियम लिथियम, कोबाल्ट, मैंगनीज और निकेल जैसी धातुओं को ई-कचरे से अलग कर निकाला जाता है।

ई-कचरे को लेकर की भविष्यवाणी

साल 2018 तक दुनियाभर में 48.5 मिलियन टन ई-कचरा पैदा हो चुका है, जिसे देखकर संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी कि अगर आने वाले समय में कचरे से निपटने के लिए कोई सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो पूरी दुनिया में कचरे की सुनामी आ जाएगी। मौजूदा समय में विश्व स्तर पर सिर्फ 20 प्रतिशत कचरे को रीसाइकिल किया जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह ई-कचरा इतना ज्यादा है कि इससे 1,25,000 जंबो जेट बनाए जा सकते हैं। अगर अब भी आपको इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा है, तो आप यह जान लीजिए कि ये 4,500 एफिल टावर जितना बड़ा कचरा है। अगर इसे एक जगह इकट्ठा कर लिया जाए, तो लगभग यह कचरा एक मैनहैटन शहर के बराबर जगह घेर लेगा।

भारत में स्थिति और भी निराशाजनक

भारत की तरफ नज़र दौड़ाएं, तो स्थिति और भी निराशाजनक है। यहां सिर्फ 2 प्रतिशत कचरे का निस्तारण किया जाता है और वह भी प्रभावी तरीके से नहीं किया जाता। अनौपचारिक क्षेत्रों में या तो इस कचरे में मौजूद प्लास्टिक को जलाकर धातु निकाली जाती है या फिर खतरनाक परिस्थितियों में उन्हें एसिड लीच किया जाता है। दोनों ही तरीके पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचाते हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धातुओं की रिकवरी दर निराशाजनक है। इस ई-कचरे का सालाना मूल्य 62.5 मिलियन डॉलर है, जो दुनियाभर की सिल्वर धातु वाली सभी खादानों से निकलने वाली धातु के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है। हालांकि यह रिपोर्ट काफी नई है। नितिन ने तो साल 2010 में ही कचरे में भारी वृद्धि की बात कह दी थी।

उन्होंने इकनॉमिक टाइम्स से ई-कचरे पर बातचीत करते हुए कहा था कि 2021 तक भारत एक मिलियन टन ई-कचरा पैदा कर देगा और साथ ही उन्होंने ई-कचरे को एक अरब डॉलर का अवसर भी बताया था। इस विषय पर काफी शोध कर, इन दोनों भाइयों ने ड्रेपर फिशर जुर्वेत्सन, ग्रेनाइट हिल इंडिया अपॉर्चुनिटी वेंचर्स, कलारी कैपिटल, फोरम सिनर्जीज और इंटरनेशनल फाइनेंस कॉर्पोरेशन, जैसे संस्थागत बैंकर्स से चार राउंड की फंडिंग में कुल 20 मिलियन डालर जुटाए थे।

एक स्थायी समाधान

दरअसल, अटेरो रीसायकल दोहरा मॉडल है। एक तरफ वे ई-कचरा खरीदते हैं और दूसरी तरफ इस कचरे से निकली धातुओं को बेचकर पैसा कमाते हैं। कंपनी के पास सैमसंग, एसर, एलजी, व्हर्लपूल, गोदरेज, फ्लेक्सट्रॉनिक्स, वीवो, ओप्पो, रिलायंस जियो, एमजी मोटर्स और मारुति सुजुकी समेत कई प्रभावशाली ग्राहक हैं।

यह कंपनी, इनवायरमेंट फ्रैंडली तरीके से ली-आयन बैटरी को रिसाइकल करने वाली एकमात्र कंपनी होने का दावा करती है। फिलहाल वह अपनी रुड़की ब्रांच में हर साल लगभग एक हजार टन ली-आयन बैटरी को रीसाइकल कर रहे हैं। नितिन कहते हैं, “भारत में किसी भी रीसाइकलर के पास ली आयन बैटरी को डिस्मेंटल करने की क्षमता नहीं है। वे इस कचरे को जलाकर या एसीड लीच कर नष्ट कर देते हैं, या बेच देते हैं।”

यह कंपनी अपनी क्षमता के अनुसार सीएफएल बल्ब से लेकर औद्योगिक उपकरण तक, 20 तरह के ई-कचरे का निपटारा करती है। इनके पास सालाना 1,44,000 टन कचरे का निपटारा करने की क्षमता है।

जब रीसायक्लिंग के बारे में लोगों ने सुना तक नहीं था

साल 2010 के दशक में ई-कचरे को रीसायकल करने के बारे में लोग जानते तक नहीं थे. ऐसे में इस उपलब्धि को हासिल करना आसान नहीं था। नितिन याद करते हुए बताते हैं, “जब हमने शुरुआत की थी, उस समय लोगों में ई-कचरे को लेकर ना के बराबर जागरूकता थी। ई-कचरे के प्रभावी निपटान की रणनीति की बात तो छोड़ ही दीजिए। उस समय लोग पुराने फ़ोन और लैपटॉप जैसी चीजों को बड़ी ही लापरवाही से खुले में फेंक देते थे या फिर किसी स्क्रैप डीलर को बेच देते थे। ये डीलर रीसाइकिलिंग के लिए काफी असुरक्षित तरीका इस्तेमाल करते हैं, जो पर्यावरण के लिए काफी बड़ा खतरा है।”

नितिन और रोहन गुप्ता ने सबसे पहले, एक मजबूत और विनियमित ई-कचरा व्यवस्था तैयार किया। इसमें पूरे भारत से ई-कचरे को पिकअप करने, संग्रह करने, इलेक्ट्रॉनिक सामान की ट्रैकिंग, रिवर्स लॉजिस्टिक्स प्रबंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स रिकवरी, डेटा स्क्योरिटी, रिफर्बिशमेंट, ई-कचरा रीसाइक्लिंग और डिस्पोजल की सुविधा दी गई थी।

कई कंपनियों से किए महत्वपुर्ण करार

उन्होंने सरकार के साथ रजिस्टर रीसाइकलर्स से करार किया। इनके पास ई-कचरे को संशोधित करने और धातु के एक-एक औंस को निकालने की कोई उन्नत तकनीक नहीं थी।

कंपनी ने प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) रीसाइक्लिंग जैसे तरीकों को अपनाया, जिसमें वे प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से तांबा, चांदी-सोना और टिन/लैड सोल्डर ड्रॉस से टिन निकालते हैं। प्लैटिनम, पैलेडियम और मैग्नेट से दुर्लभ नियोडिमियम निकालने के लिए कैटालिक कन्वर्टर को इस्तेमाल में लाते हैं। इन सभी रीसायकल्ड धातुओं को बाजार मूल्य पर बेचा जाता है।

वह बताते हैं, “हमने 300 पेटेंट के लिए आवेदन किया था, जिसमें से हमें 27 ग्लोबल पेटेंट दिए गए। हमने कैपेक्स और आरएंडडी (R&D) में महत्वपूर्ण निवेश किया है और इसे आगे भी बरकरार रखेंगे।”

कंपनी कराती है ऑन साइट विजिट

एक और चीज़ है, जो अटेरो को बाकी सबसे अलग करती है और वह है- ऑन साइट विजिट। किसी भी कंपनी के साथ जुड़ने से पहले उन्हें प्लांट का दौरा करने और पर्यावरण में तकनीकी मूल्यांकन करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। नितिन कहते हैं कि इससे न केवल हमारे पुराने ग्राहक हमारे साथ जुड़े रहते हैं, बल्कि हर महीने एक नया कस्टमर भी हमारे साथ जुड़ जाता है।

उन्होंने बताया, “UNFCC (यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था है। इन्होंने हमारे काम करने की पूरी प्रक्रिया को देखा। वह इस तथ्य से सहमत थे कि एक ग्राम कॉपर निकालने में अटेरो में जितनी ऊर्जा का प्रयोग किया गया, अगर इतनी मात्रा में खदान या फिर किसी अन्य स्रोत से कॉपर निकाला जाए, तो इससे ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ेगी। अभी तक हमने एक लाख मीट्रिक टन से ज्यादा कार्बन की बचत की है।”

पर्यावरण और समाज को स्वच्छ रखने का संकल्प

आज अगर अटेरो बड़े ही गर्व से साल दर साल 150 प्रतिशत बढ़ोतरी की बात कर रहा है, तो इसके पीछे कई कारण हैं। नितिन ने बताया, “पिछले कुछ सालों से कचरे के निपटान को लेकर काफी जागरूकता बढ़ी है। इसके अलावा, एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) नियमों के लागू हो जाने से भी इंडस्ट्री को ग्रोथ करने में काफी मदद मिली है। फिलहाल, EPR के अंतर्गत 30 उत्पाद आते हैं। उम्मीद है कि यह संख्या एक साल के अंदर 700 तक पहुंच जाएगी।”

गुप्ता बंधु, 2021 के अंत तक देश के कई राज्यों में छह फ्रेंचाइज़ स्थापित कर लेंगे। इसके जरिए वे इस परिचालन को 30,000 टन तक बढ़ाने की तैयारी में हैं। नितिन का कहना है, “पर्यावरण हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है। हम सभी को इसे संरक्षित करने के लिए प्रयास करने होंगे और सस्टेनेबल तरीकों को अपनाना होगा। आइए, हम अपने पर्यावरण और समाज को स्वच्छ रखने और ई-कचरे को वैज्ञानिक तरीके से रीसायकल करने का संकल्प लें।”

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Dhara Patel

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