मां चाहती थी बच्चा अफसर बने, आदिवासी लड़के ने पहले ही प्रयास में UPSC की परीक्षा ‘क्रैक’ कर दी

देश के कई युवा बचपन से ही IAS बनने का सपना संजोते हैं. लेकिन कुछ ही ऐसे होते हैं जो पहले ही प्रयास में उपलब्धि हासिल कर लेते हैं.

इन्हीं होनहारों में से एक हैं महाराष्ट्र के एक आदिवासी परिवार में जन्म लेने वाले प्रशांत सुरेश डगले, जिन्होंने पहले ही प्रयास में UPSC की परीक्षा ‘क्रैक’ कर अपने परिवार का नाम रौशन कर दिया.

UPSC CSE 2021 में 583वीं रैंक हासिल करने वाले से प्रशांत ने इंडिया टाइम्स हिन्दी से बातचीत की और अपनी उपलब्धि पर खुशी जताते हुए बताया कि स्कूल के दिनों से ही उन्हें सिविल सेवा में रुचि थी. 12वीं में वो अच्छे नंबरों से पास हुए थे. जिसके बाद उन्हें कुछ कर गुजरने का आत्मविश्वास मिला.

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए प्रशांत ने कहा, ”12वीं के बाद मुझे डुअल डिग्री प्रोग्राम के तहत IISER पुणे में दाखिला मिला था. वहां भी अपनी मेहनत से मैंने सबको प्रभावित किया. मेरे पास नौकरी के अच्छे अवसर थे.

लेकिन मैंने खुद को सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी में लगा दिया. मैंने UPSC के लिए बहुत अच्छी तैयारी की थी. लेकिन पहले प्रयास में इतनी अच्छी रैंक हासिल करने की उम्मीद नहीं थी.”

अपनी मां को याद करते हुए प्रशांत ने बताया कि उनकी सफलता के पीछे उनकी मां का विशेष योगदान है. मां अपने गांव की पहली ग्रेजुएट महिला थीं.

वो आगे पढ़ाई कर सकती थीं और अफसर बनने की काबिलियत रखती हैं. किन्तु, पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते वो घर तक ही सीमित रह गईं. उनकी मां हमेशा कहती थी कि बेटा मैं आगे नहीं पढ़ पाई. लेकिन तुम मत रुकना. खूब पढ़ना और नाम रौशन करना.

प्रशांत ने कहा, ”मुझे खुशी है कि मैंने मां का सपना पूरा करने की दिशा में एक छोटा ही सही लेकिन कदम बढ़ा दिया है. सफर अभी लंबा है. मौजूदा रैंक के हिसाब से मुझे IAS मिलना मुश्किल है, लेकिन परिणाम संतोषजनक है. NEXTIAS का विशेष शुक्रिया, जिसने मेरी राह आसान करने में अहम भूमिका निभाई”

2 अगस्त 1997 को जन्मे प्रशांत मूलतः महाराष्ट्र के आदिवासी गांव चिंचवणे, अकोले, अहमदनगर से आते हैं. पिता सुरेश महादू डगले नासिक में एग्रीकल्चर विभाग में काम करते है.

इसलिए परिवार अब नासिक में ही रहता है. वो जवाहर नवोदय विद्यालय, (भारत सरकार द्वारा चलाया जाने वाला मुफ्त आवासीय शिक्षण संस्थान) खेड़गांव, नासिक के स्टूडेंट रह चुके हैं. यहां से उन्होंने 6 से 12 तक की पढ़ाई का सफर तय किया.

बातचीत के अंत में प्रशांत कहते हैं कि अब नवोदय विद्यालय के संदेश ‘शिक्षार्थ आइए, सेवार्थ जाइए’ को पूरा करने का वक्त आ गया है. नवोदय विद्यालय में ग्रामीण अंचल के बच्चों के साथ पढ़ने की वजह से वो गांव की समस्याओं को अच्छे से जानते हैं. उन्हें अगर मौका मिलता है तो वो विशेष तौर पर ग्रामीण भारत के लिए काम करना चाहेंगे.

प्रशांत के माता-पिता ने भी बेटे की उपलब्धि पर खुशी जताई. उन्होंने कहा, ”हम बहुत खुश हैं, क्योंकि वह खुश है. यह सब उसके प्रयासों के कारण है. उसे केवल पढ़ाई में दिलचस्पी थी. उसने खूब मेहनत की.”

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok mantra से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है.]

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