दूसरों के घरों में काम करके इस माँ ने बेटे को पहुँचाया इसरो तक!

मुंबई के चेम्बूर इलाके में रहने वाले 25 वर्षीय राहुल घोडके का जब इसरो में तकनीशियन के पद पर चयन हुआ तो यह उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था। उनका परिवार और जानने वालों के साथ ही उन्हें पूरे देश से बधाइयाँ मिल रही हैं। और तो और उनके रिश्तेदारों और मोहल्ले वालों ने तो उनके लिए खास जश्न भी रखा।

बेशक, देश के प्रतिष्ठित स्पेस संस्थान में चयनित होना गर्व की बात है। लेकिन राहुल की कहानी में सिर्फ यही खास बात नहीं है कि वह इसरो में काम कर रहे हैं बल्कि उनकी कहानी को सबसे अलग बनाता है उनका और उनकी माँ का संघर्ष। क्योंकि जिस लड़के को अपने पिता की मृत्यु के बाद अचानक स्कूल छोड़ना पड़ा हो, उसके लिए शायद ही किसी ने सोचा होगा कि वह एक दिन इसरो में काम करेगा।

अपने जीवन के इस सफर के बारे में द बेटर इंडिया से बात करते हुए राहुल ने बताया कि उनकी पांचवीं तक की पढ़ाई सरकारी स्कूल से हुई। फिर जब छठी कक्षा में उनका स्कूल बदलवाना पड़ा तो उनके परिवार के पास उनकी नई यूनिफार्म तक लेने के लिए भी पैसे नहीं थे। ऐसे में उनकी मौसी ने उनके परिवार की मदद की थी।

“पर मैं पढ़ने में अच्छा था। दसवीं में भी अपने एरिया में मेरे सबसे ज़्यादा नंबर थे और मैंने 11वीं कक्षा में कॉमर्स स्ट्रीम से दाखिला लिए। लेकिन फिर अचानक मेरे पापा चले गये और उनके जाने के साथ ही हमारी आर्थिक स्थिति और खराब हो गयी। मेरी बड़ी बहन दर्शना उस वक़्त ग्रेजुएशन कर रही थी,” उन्होंने आगे कहा।

ऐसे में, उनकी माँ, शारदा घोडके ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को अच्छी ज़िन्दगी देंगी। उन्होंने दूसरे लोगों के घर पर झाड़ू-पौंछा और बर्तन साफ़ करने का काम करना शुरू कर दिया। लेकिन मुंबई जैसे शहर में रहना और दो बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकालना आसान नहीं था। अपनी माँ को यूँ दिन-रात काम करते देखकर राहुल को बहुत बुरा लगता और उन्होंने खुद फैसला किया कि वह अपनी माँ की मदद करेंगे।

“ग्यारहवीं में मैंने पढ़ाई छोड़ दी। एक जगह मम्मी कैटरर का काम करती थी और मैं भी वहीं जाकर उनकी मदद करने लगा। फिर मुझे एक इलेक्ट्रीशियन के साथ काम करने को मिला और उससे मैंने बहुत सी चीजें सीखी। शुरू में तो उनके साथ मैं हेल्पर के जैसे ही काम करता था पर फिर मुझे काम आ गया तो मुझे भी लोग अपने घरों में वायरिंग का काम देने लगे,” राहुल ने कहा।

यहीं से राहुल को इलेक्ट्रिक और टेक्निकल कामों का चस्का लगा। दो सालों तक राहुल ने अपने घर-परिवार को सम्भालने के लिए काम किया। फिर उनकी बहन की ग्रेजुएशन पूरी हो गयी, वह जॉब करने लगी और उन्होंने राहुल को अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए कहा। इसके बाद राहुल ने आईटीआई गोवंडी में इलेक्ट्रॉनिक ब्रांच में दाखिला ले लिया।

यहाँ पढ़ते-पढ़ते भी राहुल पार्ट टाइम काम करते थे। वह बस इतना चाहते थे कि कोर्स पूरा होने के बाद उन्हें कहीं ढंग की नौकरी मिल जाये, ताकि उनकी माँ और बहन के कंधों से बोझ हल्का हो। उन्होंने आईटीआई में भी अपनी ब्रांच में टॉप किया और फिर वहीं से उन्हें लार्सेन एंड टुब्रो कंपनी में इंटर्नशिप मिल गयी।

“किस्मत से, जब मेरी इंटर्नशिप वहां शुरू हुई तो वहां इसरो का एक प्रोजेक्ट आया था। मुझे भी उस प्रोजेक्ट में काम करने का मौका मिला। तब मैंने इसरो, DRDO जैसे संगठनों के बारे में और पढ़ा। तब भी दिमाग में इतना नहीं था कि यहाँ काम करना है। मैं बस चाहता था कि एक स्टेबल जॉब मिल जाये ताकि घर पर टेंशन खत्म हो।”

इसलिए राहुल ने अपने एक सीनियर से कहा भी कि इंटर्नशिप के बाद वह वहीं काम करने को तैयार हैं, अगर वह उन्हें रख सकते हैं तो। लेकिन उनके सीनियर ने उन्हें कहा, “खुद को कम मत आंको। अभी तुम्हे लगा रहा है कि यहाँ हो जायेगा तो अच्छा है, पर अच्छा यह है कि तुम आगे और पढ़ो।” अपने सीनियर की बात मानकर ही राहुल ने इंटर्नशिप के साथ-साथ डिप्लोमा में दाखिला ले लिया।

“थोड़ा मुश्किल था, लेकिन मैंने मैनेज किया। मेरे साथ-साथ मम्मी और बहन ने भी। मैं सुबह से लेकर रात के 10 बजे तक काम, क्लासेस, इसी सबके बीच रहता था। फिर रात को पढ़ाई करने बैठता था। अब घर में अलग-अलग कमरे तो थे नहीं, ऐसे में पूरी रात लाइट ऑन रहती थी। लेकिन कभी भी मम्मी और बहन, कितनी भी थकी हुई हों, उन्होंने शिकायत नहीं की। बल्कि रात में कई बार उठकर मम्मी चाय बनाकर दे देती थीं,” राहुल ने नम आवाज़ में कहा।

वह आगे कहते हैं कि यह उनकी किस्मत थी कि इसरो का आईटीआई डिप्लोमा होल्डर्स के लिए जॉब नॉटीफिकेशन आया और जैसे ही उन्हें पता चला तो उन्होंने तुरंत अप्लाई कर दिया। एंट्रेस परीक्षा में वह देश भर के आरक्षित उम्मीदवारों की सूची में तीसरे और ओपन केटेगरी में 17वें स्थान पर रहे। उन्हें इसरो के अहमदाबाद सेंटर में तकनीशियन का पद मिला।

“मुझे यहाँ तक पहुंचाने में मेरी माँ और मेरी बहन ने बिना थके दिन-रात काम किया है। उनके अलावा, मेरी मौसी ने हमारा बहुत साथ दिया। जब रिजल्ट आया तो यह हमारे घर में जश्न के जैसा था क्योंकि किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था। अभी भी सब कुछ सपने जैसा ही लगता है।”

उनकी जॉब के बाद उनके घर के हालात बहुत सुधरे हैं। और राहुल कहते हैं कि उन्होंने जो भी मुश्किलें झेलीं या फिर उनका वह संघर्ष, जिसके बाद वह यहाँ तक पहुंचे हैं, अब उनके लिए प्रेरणा की तरह है। बाकी उन्हें गर्व है कि वह अपने देश के लिए कुछ कर रहे हैं।

अंत में अपने जैसे बच्चों के लिए राहुल बस यही सन्देश देते हैं, “मैंने अपनी ज़िन्दगी से एक बाद ज़रूर सीखी है कि हालात जो भी हों, आपको यदि कुछ आगे लेकर जा सकता है तो वह है शिक्षा और आपकी मेहनत। मैं हर किसी से कहूँगा कि किसी भी कीमत पर अपनी पढ़ाई से पीछे न हटें। जितना आगे पढ़ सकते हैं पढ़ें और मुश्किलें तो आती ही हैं, लेकिन आप ठान लें तो सब मुमकिन हो जाता है।”

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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