50 हजार रुपये लोन निकालकर शुरू किया खतरनाक बिजनेस; आज सालाना करती है 500 करोड़ रुपये का बिजनेस

सन 1961 में महाराष्ट्र के अकोला जिले के छोटे से गाँव रोपरखेड़ा के गरीब दलित परिवार में कल्पना सरोज का जन्म हुआ. इस महिला ने इतनी कठिनाइयों और मुश्किलों से लड़कर आज के समय में करोड़ो की कंपनी खड़ी कर दी है.

कल्पना के पिता एक हवलदार की नौकरी करते थे और कल्पना के पिता महीने के 300 रुपये वेतन कमाते थे. कल्पना अपने 2 भाई, 3 बहन, दादा-दादी और चाचा के साथ पुलिस क्वार्टर में रहती थी.

कल्पना एक सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. दलित होने के कारण बहुत बार कल्पना को उपेक्षा भी झेलनी पड़ती थी. 12 साल की उम्र में ही कल्पना के पिता ने उनकी शादी कर दी और फिर विवाह के बाद कल्पना के ससुराल वालों ने उन्हें बहुत ही ज्यादा परेशान करने लगे.

कल्पना ने एक इंटरव्यू में यह भी बताया था कि ससुराल वाले उसको खाना भी नहीं देते थे और बाल पकड़कर बहुत ही बेरहमी से मारते भी थे और जानवरों से भी ज्यादा बुरा बर्ताव करते थे.

कल्पना 16 साल की उम्र में नौकरी करने लगी

जब कल्पना 16 साल की हुई तो फिर वे मुंबई में अपने चाचा के पास चली गईं. कल्पना सिलाई का काम बहुत ही अच्छी तरह से जानती थी तो फिर कल्पना के चाचा ने उन्हें एक कपड़ा मिल में नौकरी दिलवा दी.

इसके बारे में कल्पना ने यह बताया हैं कि वे मशीन को चलाना बहुत ही अच्छे से जानती थी पर ना जाने क्यों उनसे उस समय मशीन चली ही नहीं, इस वजह से कल्पना को धागे काटने का काम दे दिया गया था, और इस काम के लिए कल्पना को रोज के दो रूपये मिलते थे.

फिर कल्पना ने कुछ दिनों तक यह धागे काट लेने का काम करा था फिर उन्होंने अपना आत्मविश्वास पूरी तरह से वापस पा लिया और वे मशीन भी चलाने लगीं, और फिर इस काम के लिए उन्हें महीने के सवा दो सौ रुपये मिलने लगे.

कल्पना का सफलता की तरफ कदम

मुश्किलों के दिनों में कल्पना ने अपनी जिन्दगी से गरीबी मिटा लेने का प्रण ले लिया था. कल्पना ने यह सोचा कि अगर वे हर दिन 4 ब्लाउज को सिलती है तो फिर उन्हें करीब 40 रुपए मिला करेंगे और फिर इस पैसो से घर की भी काफी ज्यादा मदद होगी.

कल्पना ने बहुत ही ज्यादा मेहनत करने लगी, दिन में लगभग 16 घंटे तक काम करके कल्पना ने पैसे भी जोड़े और अपने घरवालों की भी मदद करने लगी.

कल्पना ने लिया था 50 हजार रुपये लोन

इसी समय ही कल्पना ने यह देखा कि सिलाई और बुटीक के काम में काफी ज्यादा स्कोप और कमाई है और कल्पना ने इसे एक बिजनेस के तौर समझा.

फिर उन्होंने महाराष्ट्र की सरकार के द्वारा चलायी जा रही ‘महात्मा ज्योतिबा फुले योजना’ के अंतर्गत 50,000 रूपये का कर्ज ले लिया और फिर 22 साल की उम्र में कल्पना ने फर्नीचर का बिजनेस शुरू कर दिया जिसमे की कल्पना को सफलता भी मिली.

फिर इसके बाद में कल्पना ने इसके साथ ही साथ एक ब्यूटी पार्लर की दुकान भी खोल ली फिर इसके बाद इस महिला ने स्टील फर्नीचर के एक व्यापारी के साथ शादी कर ली मगर वर्ष 1989 में एक पुत्र और पुत्री की जिम्मेदारी कल्पना पर छोड़ कर वे इस दुनिया को अलविदा कह गये.

आज कल्पना है 500 करोड़ का टर्नओवर करने वाली कंपनी की मालकिन

कल्पना के बुरे दिनों में उनके संघर्ष और मेहनत को जानने वाले उसके मुरीद हो गए और फिर मुंबई में उन्हें पहचान मिलने लगी. कल्पना साल 2000 से कम्पनी के लिए काफी ज्यादा संघर्ष कर रही थीं और फिर साल 2006 में कोर्ट ने उन्हें कमानी इंस्ट्रीज का मालिक बना दिया था.

उन्होंने इस कम्पनी को मॉर्डनाइज्ड करा और धीरे-धीरे उसे एक सिक कंपनी से बाहर निकाल कर एक प्रॉफिटेबल कंपनी बना दिया. ये कल्पना सरोज का ही कमाल है कि आज कमानी तुबेस करीब 500 करोड़ से भी ज्यादा की कंपनी बन चुकी है.

कल्पना सरोज की इस महान उपलब्धि के लिए उन्हें साल 2013 में ‘पद्म श्री’ सम्मान से भी नवाज़ा जा चूका है और किसी भी तरह का कोई बैंकिंग बैकग्राउंड ना होते हुए भी भारत सरकार ने कल्पना सरोज को भारतीय महिला बैंक के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में शामिल करा है.

इसके साथ ही कल्पना सरोज केएस क्रिएशंस, कल्पना बिल्डर एंड डेवलपर्स, कमानी स्टील्स, कल्पना एसोसिएट्स जैसी दर्जनों कंपनियों की भी आज के समय में मालकिन हैं.

इन सभी कंपनियों का रोज का टर्नओवर भी करोड़ों का है. यदि कुल मिलाकर देखा जाए तो कभी दो रुपए रोज के कमाने वाली कल्पना सरोज आज करीब 700 करोड़ के साम्राज्य को संभाल रही हैं.

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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