एक वकील जो देश के लिए अंग्रेजों से भिड़ा और गोदरेज को भारत के घर घर तक पहुंचाया

भारतीय घरों में गोदरेज नाम उतना ही जाना पहचाना है जितना क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर और बॉलीवुड में अमिताभ बच्चन. बात तालों की हो या अलमारी की सबसे पहले गोदरेज का नाम ही जुबान पर आता है. लेकिन इस जाने पहचाने ब्रांड की पूरी कहानी से आप कितने वाकिफ हैं? किसने इस कंपनी को खड़ा किया, कहां से इसकी शुरुआत हुई, कितना लंबा इसका सफर रहा और आज ये कंपनी कहां है? क्या आपके पास इन सवालों के जवाब हैं? नहीं हैं तो कोई बात नहीं, हम आपको बताते हैं इस गोदरेज की पूरी कहानी और इन सवालों के जवाब.

कहानी शुरू होती है एक वकील से

ये कहानी शुरू होती है एक वकील से, जिसके सिद्धांत मोहनदास करमचंद गांधी के सिद्धांतों से 100% मेल खाते थे. वकालत के पेशे में झूठ का न इस्तेमाल करने का सिद्धांत. ईस्ट अफ्रीका में वकालत कर रहे इस वकील ने जल्द ही वकालत से दूरी बना ली क्योंकि ये समझ गए कि इनकी सच्चाई का सिद्धांत इस वकालत में काम नहीं आने वाला. इनका नाम था आर्देशिर गोदरेज. ये पारसी लड़का जल्द ही वकालत को अलविदा कह कर भारत लौट आया और 1894 में बंबई से एक नए जीवन की शुरुआत की.

3 हजार के कर्ज से शुरू किया बिजनेस

अन्य पारसी लोगों की तरह इसे भी बिजनेस में हाथ आजमाना था लेकिन फिलहाल आजीविका के लिए इन्होंने एक फार्मा कंपनी में केमिस्ट के असिस्टेंट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया. नौकरी में उनका मन नहीं लगा और उन्होंने मौका देखते हुए जल्द ही सर्जरी के ब्लेड और कैंची बनाने का काम शुरू कर दिया. इसके लिए उन्होंने पारसी समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति मेरवानजी मुचेरजी कामा से 3 हजार रुपए उधार लिए. हालांकि उनका ये बिजनेस चल नहीं पाया.

पहला बिजनेस हुआ फेल

उनके बिजनेस के फेल होने के पीछे उनकी एक ऐसी जिद थी जिसके बारे में जानकर आपको गर्व होगा. दरअसल आर्देशिर को एक ब्रिटिश कंपनी के लिए सर्जरी के औजार बनाने थे. यही कंपनी इन औजारों को बेचने वाली थी. सब तय हो चुका था लेकिन पेंच फंस गया देश के नाम पर. आर्देशिर अपने प्रोडक्ट्स पर ‘मेड इन इंडिया’ लिखना चाहते थे लेकिन ब्रिटिश इसके लिए तैयार नहीं थे. उसका मानना था कि ‘मेड इन इंडिया’ लिख देने से प्रोडक्ट नहीं बिकेंगे. यहीं से जो पेंच फंसा उसने आर्देशिर गोदरेज का पहला धंधा ही बंद करवा दिया.

आपदा में खोज निकाला अवसर

शायद नियति ने ही ऐसा फैसला लिया था क्योंकि आर्देशिर को कुछ अलग जो करना था. यही वजह थी कि अपनी असफलता के बाद भी वह निराश नहीं हुए. आर्देशिर की किस्मत बदली अखबार में छपी एक खबर ने. इस खबर के मुताबिक बंबई में चोरी की घटनाएं कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थीं. इस संबंध में उस समय बंबई के पुलिस कमिश्नर ने लोगों से कहा कि ‘सभी लोग अपने घर और दफ्तर की सुरक्षा और बेहतर करें.’

हालांकि ये एक सामान्य सी खबर थी लेकिन आर्देशिर ने इसे बिजनेस के नजरिए देखा और आपदा में अवसर खोजते हुए ताले बनाने का फैसला किया. बाजार में ताले पहले से मौजूद थे लेकिन वे हाथ से बने होते थे जो ज्यादा सुरक्षित नहीं होते थे. ऐसे में आर्देशिर ने ऐसे ताले बनाने का फैसला किया जो सुरक्षित हों.

हालांकि इसके लिए उन्हें फिर से फंड की जरूरत थी और वह एक बार फिर से अपना आइडिया लेकर मेरवानजी के पास पहुंचे. ये आर्देशिर की हिम्मत ही थी जो बिना पिछला कर्ज चुकाये वो फिर से कर्ज मांगने के लियी मेरवानजी कामा के पास पहुंच गए थे. लेकिन किस्मत ने उनका साथ दिया और कामा उनके आइडिया से प्रभावित हुए.

फिर से मिला कर्ज

आर्देशिर को मेरवानजी से कर्ज मिल गया और बॉम्बे गैस वर्क्स के बगल में 215 वर्गफुट के गोदाम लेकर वहां ताले बनाने का काम शुरू कर दिया. इसके साथ ही जन्म हुआ गोदरेज कंपनी का. हालांकि उस दौर में तालों के सुरक्षित होने की कोई गारंटी नहीं देता था लेकिन गोदरेज ने ये रिस्क लिया और इस करार के साथ ताले बेचना शुरू कर दिया कि ‘हर ताले और चाबी का सेट अनूठा है. कोई दूसरी चाबी ये ताला नहीं खोल सकती.’

चमक गई किस्मत

कमाल की बात ये थी कि लोगों ने गोदरेज पर भरोसा किया और देखते ही देखते गोदरेज के ताले भरोसे की नई मिसाल बन गए. तालों का कारोबार जब चल पड़ा तो आर्देशिर ने अन्य व्यापार में भी कदम रखना शुरू किया. आर्देशिर और गोदरेज के अगले बिजनेस की नींव भी लोगों की आर्थिक सुरक्षा की समस्या पर ही रखी गई. अमीरों के शहर बंबई में लोगों के पास तब बैंक लॉकर जैसी सहूलियतें नहीं थीं. उन्हें नकदी और जेवरात घर में ही रखने पड़ते थे. ऐसे में आर्देशिर को ऐसी अलमारी बनाने का प्लान आया जिसमें लोगों का धन सुरक्षित रह सके और चोर आसानी से उसे न तोड़ सकें.

अलमारी ने फिर से किया कमाल

इंजीनियर और अपने कारीगरों के साथ महीनों तक मंथन करने के बाद आर्देशिर ने तय किया कि वह एक ऐसी अलमारी बनाएंगे जो लोहे की चादर को बिना काटे बने. 1902 में गोदरेज की अलमारी बाजार में आई. आर्देशिर की मेहनत एक बार फिर रंग लाई. देखते-देखते इस अलमारी ने लोगों का भरोसा जीत लिया और एक बार फिर से लोगों का गोदरेज पर विश्वास बढ़ गया.

एक के बाद एक नए बिजनेस

ताले और अलमारी के बाद तो गोदरेज ने कितने तरह के ब्रांड में कदम रखा और कामयाब हुई इसकी गिनती भी बहुत मुश्किल है. 1918 में दुनिया का पहला वनस्पति तेल वाला साबुन, 1923 में अलमारी के साथ फर्नीचर बिजनेस, 1951 में पहले लोकसभा चुनाव के लिए 17 लाख बैलेट बॉक्स, 1952 में स्वतंत्रता दिवस पर सिंथॉल साबुन का लॉन्च, 1958 में रेफ्रिजरेटर बनाने वाली पहली भारतीय कंपनी बनी,1974, लिक्विड हेयर कलर प्रोडक्ट्स लाए, 1990 में रियल एस्टेट बिजनेस में कदम रखा, 1991 में खेती के कारोबार में कदम रखा, 1994 गुड नाइट ब्रैंड बनाने वाली कंपनी ट्रांस्लेक्टा खरीदी और फिर 2008 में चंद्रयान-1 के लिए लॉन्च व्हीकल और ल्यूनर ऑर्बिटर बनाए.

कभी एक सर्जरी ब्लेड बनाने के बिजनेस में फेल होने वाले आर्देशिर गोदरेज का खड़ा किया गोदरेज समूह आज करीब 20 तरह के कारोबार कर रहा है. गोदरेज के प्रोडक्ट्स दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में बिक रहे हैं. इनका साझा मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 1.2 लाख करोड़ रुपए का है.

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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