उस IPS ऑफिसर की कहानी, जिसने दो बार दी ‘मौत को मात’, अब लेखक बनकर लोगों को दे रहे हैं प्रेरणा

दुनिया में दो तरह के इंसान होते हैं, एक वो जो अपना और अपने परिवार का भविष्य संवारने के लिए एक अच्छा पद पाने का प्रयास करते हैं और दूसरे वो जो खुद को आने वाली पीढ़ी के लिए मिसाल बनाने के मंसूबे से किसी पद को पाने का प्रयास करते हैं. सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी डॉ. प्रतीप वी फिलिप दूसरे किस्म के लोगों में से हैं.

कलम से बदलाव लाने का प्रयास

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी प्रतीप वी फिलिप एक पूर्व पुलिस ऑफिसर होने के साथ साथ एक लेखक और मोटिवेशनल राइटर भी हैं. ट्रेनिंग, पुलिस महानिदेशक रहे प्रतीप साल 2021 में सेवानिवृत्त हुए थे. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने समाज में बदलाव लाने के प्रयास नहीं छोड़े. फर्क बस इतना था कि रिटायर होने से पहले वह पुलिस की वर्दी में अपना फर्ज निभा रहे थे तथा इसके बाद उन्होंने कलम को हथियार बना कर बदलाव लाने का फैसला किया.

आईपीएस प्रतीप की पुलिस लाइफ आसान नहीं रही. इस दौरान उन्होंने जो अनुभव किया उसी के दम पर वह आज अन्य लोगों को प्रेरित कर रहे हैं. उनके जीवन के इन मुश्किल अनुभवों ने उन्हें एक प्रतिष्ठि लेखक बना दिया. दो बार मौत को मात दे चुके प्रतीप का अब तक का जीवन हर किसी के लिए एक प्रेरणा है.

बचपन से रहा एक ही लक्ष्य

बेंगलुरु में जन्में और पाले बढ़े प्रतीप अपने वन-लाइनर और क्वोट्स के लिए जाने जाते हैं. स्कूल के दिनों से ही प्रतीप का सिर्फ एक ही सपना था. उन्होंने बहुत पहले ये तय कर लिया था कि उन्हें सिविल सर्विसेज में जाना है. 1984 में प्रतीक जब पोस्ट-ग्रेजुएशन के प्रथम वर्ष में थे तभी उन्हें एसबीआई ने बेंगलुरु में एक परिवीक्षाधीन अधिकारी के रूप में नियुक्त कर लिया था.

द वीकेंडलीडर के अनुसार प्रतीप ने बताया कि उन्होंने अखिल भारतीय सिविल सेवा पर अपना लक्ष्य निर्धारित किया था. 1986 में बैंक में काम करते हुए उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा दी और 1987 में आईपीएस बन गए.

दो बार मौत को दी मात

एक आईपीएस के रूप में प्रतीप का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने इस दौरान डॉ बार मौत का सामना किया और इसे मात दी. पहली बार प्रतीप का मौत से सामना तब हुआ जब वह एक युवा आईपीएस थे. इस दौरान वह समुद्र की एक धार संग बह गए थे वह लगभग डूब चुके थे लेकिन उन्हें उनके बॉस तथा तत्कालीन एसपी द्वारा बचा लिया गया. उन्हें डूबने से बचाने के बाद उनके बॉस ने सीपीआर की मदद से उन्हें पुनर्जीवित किया था.

प्रतीक ने इस घटना के बारे में बताते हुए कहा था कि “यह पहला मौका था जब उन्हें अहसास हुआ कि भगवान ने उनकी जिंदगी के बारे में कुछ खास सोचा हुआ है.

इसके अलावा उनके जीवन में कभी न भुलाया जा सक्ने वाला हादसा 1991 में घटित हुआ. इस दौरान वह एक ह्यूमन बॉम्ब ब्लास्ट हादसे में बाल बाल बचे. दरअसल ये अविस्मरणीय भयानक अनुभव प्रतीप को तब हुआ जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चेन्नई के पास श्रीपेरंबुदूर में मानव बम विस्फोट द्वारा हत्या कर दी गई थी. इस दौरान प्रतीप उनके समीप ही खड़े थे.

इस घटना के समय फिलिप एएसपी थे. बम धमाके में उनके शरीर को सैकड़ों स्टील के टुकड़ों ने बींध दिया था, उनके चेहरे से लेकर पैरों तक कई फ्रैक्चर हुए थे तथा वह 20% जल चुके थे. इतना होने के बावजूद प्रतीप ने मृत्यु को हरा दिया. वह चमत्कारिक रूप से चोटों से उबर गए और उनके शरीर को कोई स्थायी क्षति नहीं हुई. इस हादसे में घायल हुए शरीर को फिर से काबिल बनाने में उन्हें लगभग एक साल का समय लगा.

उस विस्फोट के दौरान, गंभीर रूप से घायल प्रतीप को पुरुषोत्तम नाम के एक युवक द्वारा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया था. यह उनका सामयिक और निस्वार्थ कार्य था जिसने आम लोगों के बारे में प्रतीप के विश्वास को और मजबूत किया.

जीवन को मिला नया मकसद

फिलिप ने अपने एक कोट में कहा है कि ‘फिलिपिज्म’ को अपने उपनाम फिलिप के जोड़ा लेकिन इसका मतलब इससे कहीं अधिक है. वे कहते हैं ‘फिलिप’ शब्द का अर्थ है प्रोत्साहन होता है. उनका विचार हर इंसान को अपना सर्वश्रेष्ठ करने के लिए और सर्वश्रेष्ठ बनने के लिए प्रोत्साहित करना है.

प्रतीप ने अपनी किताब को फिलिपिज्म्स – 3333 मैक्सिम्स टू मैक्सिमाइज योर लाइफ शीर्षक दिया है. इस किताब में फिलिप के 3333 कॉपीराइट कोट्स का संग्रह है. इसके साथ ही प्रतीप दुनिया के पहले ऐसे लेखक बन गए हैं जिन्होंने सबसे ज्यादा मौलिक कोट्स का संग्रह किया है.

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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