उसके गांव की लड़कियां रेस में हिस्सा नहीं लेती थी और वो वर्ल्ड U20 एथलेटिक्स में 2 मेडल जीत लाई

रूपल चौधरी ने वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में दो पदक हासिल कर इतिहास रच दिया. इस चैंपियनशिप में दो पदक जीतने वाली वो पहली भारतीय एथलीट हैं. रूपल ने पहले 4X400 मीटर रिले रेस में सिल्वर जीता. इसके बाद उन्होंने महिलाओं की 400 मीटर दौड़ में ब्रोन्ज़ पदक जीता.

किस दौड़ में जीता पदक

रूपल चौधरी ने वर्ल्ड अंडर 20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप्स में पहले मंगलवार को 4X400 मीटर मिक्स्ड रिले रेस में सिल्वर मेडल जीता. भारत के बारथ श्रीधर, प्रिया मोहन, कपिल और रूपल चौधरी ने 3 मिनट 17.76 सेकेंड में रेस पूरी की और नया एशियन जूनियर रिकॉर्ड भी बना डाला.

रेस अमेरिका ने जीती और भारतीय धावक अमेरिका से सिर्फ़ 0.07 सेकेंड पीछे रह गए. ये मेडल रूपल समेत सभी धावकों के इसलिए भी खास है क्योंकि भारतीय धावक रेस से एक दिन पहले कोलंबिया पहुंचे थे.

इस रेस के बाद बीते गुरुवार को रूपल ने 400 मीटर रेस में ब्रोन्ज़ अपने नाम कर लिया. रूपल ने 51.85 सेकेंड्स में रेस पूरी की. केन्या के डामारिस मुतुंगा ने स्वर्ण और ग्रेट ब्रिटेन के येमी मैरी जॉन ने रजत पदक अपने नाम किया. रिले रेस के दिन ही रूपल ने 400 मीटर के पहले राउंड में हिस्सा लिया था.

किसान की बेटी ने विश्व स्तर पर रौशन किया नाम

रूपल चौधरी मेरठ, उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार से आती हैं. The Times of India के लेख के अनुसार रूपल का परिवार मेरठ के शाहपुर जैनपुर गांव में रहता है. उनके पिता खेती-बाड़ी करते हैं और इसी से रूपल का घर चलता है.

पीवी सिंधू और साक्षी मलिक से मिली प्रेरणा

2016 रियो ओलंपिक में पी वी सिंधू और साक्षी मलिक ने मेडल्स जीते थे. ये देखकर रूपल के मन में उत्साह जागा और पैरों में मानो नवीन रक्त संचार हो गया. रूपल ने तय कर लिया कि वो एथलीट बनेंगी. कैसे बनेंगी, कब बनेंगी ये सब वो नहीं जानती थी लेकिन तय कर लिया था कि एथलीट बनेंगी. रूपल ने ठान तो लिया था लेकिन राह में कई मुश्किलें उनका इंतज़ार कर रही थी.

रूपल के गांव की लड़कियां दौड़ में हिस्सा नहीं लेती थी

Sportstar के एक लेख की मानें तो रूपल के एथलीट बनने का सफ़र भूख हड़ताल से शुरू हुआ था. रूपल के पिता, ओम वीर चौधरी ने बताया कि उनके गांव में लड़कियां दौड़ में हिस्सा नहीं लेती. लेकिन रूपल इन बंदिशों से कहां रुकने वाली थी, 2016 में उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें एथलीट बनना है. उनके गांव से नज़दीकी एथलेटिक्स स्टेडियम मेरठ में थे. पिता जी से परमिशन मांगी लेकिन वे राज़ी नहीं हुए.

रूपल ने बताया, ‘पहले तो उन्होंने कहा कि वो स्टेडियम ले जाएंगे लेकिन बहाने बनाते रहे और टालटे रहे. उन्हें शायद लग रहा था कि मैं कुछ दिनों में ज़िद्द छोड़ दूंगी.’

भूख हड़ताल से शुरू हुआ करियर

लगभग 1 साल तक पिताजी को बोलने के बाद भी जब कोई हल नहीं निकला तब 12 साल की लड़की ने सत्याग्रह करने का निर्णय लिया. रूपल ने बताया कि जब उन्हें समझ आ गया कि पिता जी स्टेडियम नहीं ले जाएंगे तब उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की.

पिता जी को समझ आ गया कि बेटी ने ठान लिया है और इरादे पक्के हैं. इसके बाद ओम वीर चौधरी, रूपल को स्टेडियम ले गए.

कोच विशाल की नज़र पड़ी

स्टेडियम में आए कुछ ही दिन हुए थे कि रूपल पर नेशनल 200 मीटर गोल्ड मेडलिस्ट, विशाल सक्सेना की नज़र पड़ी. सक्सेना ने बताया कि उन्हें इस लड़की में कुछ अलग नज़र आया. बता दें कि रूपा देश की सबसे लंबी 400 मीटर धावकों में से एक है, उनकी हाइट 5’9″ है.

कोच को तो प्रतिभा नज़र आ गई लेकिन बाकियों को इस प्रतिभा को पहचानने में वक्त लगा. रूपल के पिता ही उन्हें स्टेडियम ले जाते थे. जिस दिन उन्हें काम रहता, रूपल स्टेडियम नहीं जा पाती थी और घर पर रोती थी.

पिता का समर्थन मिला

रूपल अपने पहली प्रतियोगिता के लिए विशाखापट्टनम गई और उनके पिता भी उनके साथ गए. इस प्रतियोगिता में उन्होंने कोई मेडल नहीं जीता. इसके बाद इंटर-डिस्ट्रिक्ट नेशनल्स में 600 मीटर दौड़ में उन्होंने सिल्वर जीता.

मेडल देखकर उनके पिता भी खुश हुए और धीरे-धीरे पिता का समर्थन बढ़ता गया. रूपल जहां भी जाती हैं उनके पिता साथ ही ट्रैवल करते हैं. खेती-बाड़ी का काम हो लेकिन अगर रूपल की रेस है तो पिता अब हर काम छोड़कर बेटी के साथ जाते हैं.

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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