किसान का अपमान देख CA की नौकरी छोड़ किया खेती करने का फैसला, अब कमाते हैं 50 लाख सालाना

किसान का अपमान देख CA की नौकरी छोड़ किया खेती करने का फैसला, अब कमाते हैं 50 लाख सालाना

किसान और खेती की बात होते ही हमारे जहन में फटे पुराने कपड़े और जी तोड़ मेहनत करने वाले किसान की तस्वीर दिमाग़ में उभर आती है। क्योंकि दशकों से हम यही देखते आए हैं कि खेती गाँव के रहने वाले लोगों का पेशा है जिन्हें ना तो ज़्यादा ज्ञान होता है और ना ही वह ज़्यादा पढे-लिखे होते हैं।

लेकिन यह पूरा सच नहीं है। आज देश के कुछ एक लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने खेती के लिए बड़ी-बड़ी नौकरियाँ छोड़ दी। आज वह खेती के जरिए ही लाखों रूपये भी कमा भी रहे हैं। लीक से हटकर चलने वाले लोगों की कहानी समाज के बीच कम ही आ पाती है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे ही किसान की कहानी बताने जा रहे हैं। जिन्होंने पहले पढाई पूरी की फिर CA की नौकरी की और अब नौकरी छोड़ खेती में उतरे हैं और सालाना लाखों रूपये की कमाई भी कर रहे हैं।

कौन हैं राजीव बिट्टू 

राजीव बिट्टू बिहार के ज़िला गोपालगंज  के मूल रूप से रहने वाले हैं। उनका परिवार संयुक्त परिवार है। राजीव अपनी बहनों और भाइयों में सबसे बड़े हैं और उन्हीं के साथ घर पर रहते हैं। राजीव के पिता बिहार सरकार के द्वारा निर्मित सिंचाई विभाग के इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। राजीव बिहार में पढ़ने के बाद आगे पढ़ने के लिए झारखंड चले गए थे। झारखंड के हजारीबाग के एक सरकारी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी करने लगे। राजीव के पिता सरकारी इंजीनियर थे ऐसे में राजीव का भी सपना था कि पढ़ लिखकर कुछ बड़ा किया जाए।

आईआईटी (IIT) का सपना रह गया अधूरा

राजीव ने हजारीबाग से अपनी पढाई पूरी की और रांची चले गए। उनका सपना IIT में दाखिला लेना था। ऐसे में कुछ सालों तक IIT की तैयारी की पर संयोंग वंश उनका दाखिला IIT में नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने बी काॅम करने की सोची और बी काॅम में दाखिला ले लिया। साथ-साथ CA में भी दाखिला ले लिया। साल 2003 में वो समय आ गया जब वह CA की पढाई पूरी कर ली और CA बन गए।

इसके बाद राजीव ने नौकरी करने का निर्णय लिया और उस समय उनका वेतन 40 हज़ार रूपये था। ऐसे में उन्होंने 5 हज़ार रूपये पर किराए पर घर लिया और नौकरी करने लगे। साल 2009 में वह समय आ गया जब उन्होंने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया और रशिम सहाय से विवाह कर लिया। जो कि पेशे से “प्लास्टिक इंजीनियर” हैं।

तब किया किसान बनने का निर्णय

साल 2013 में राजीव अपनी बेटी को लेकर गोपालगंज गए हुए थे। तभी उन्होंने देखा कि उनकी बेटी गाँव के लोगों के साथ बहुत खुश रहती है। एक दिन राजीव अपने बेटी के व्यवहार से आश्चर्यचकित रह गए। हुआ यूं कि वह एक किसान के गोद में इसलिए नहीं जाना चाहती थी क्योंकि वह उस किसान के कपड़ों में लगी गंदगी से दूर रहना चाहती थी। जो कि अमूमन हम शहर के बच्चों में आमतौर पर देखते हैं।

परन्तु यह देख राजीव को बहुत बुरा लगा और उन्होंने ख़ुद खेती करने का फ़ैसला किया। इसके बाद राजीव ने नौकरी छोड़ तय किया कि अब वह अपने घर खेती का काम करेंगे। ताकि उनके बच्चे ज़मीन से जुड़ सकें। हांलाकि, राजीव के घर पर खेती की कोई ज़मीन नहीं थी। ऐसे में इतनी अच्छी नौकरी छोड़कर खेती करने का फ़ैसला करना लोगों की नज़र में मूर्खता ही थी।

इस तरह की खेती की शुरूआत

क्योंकि राजीव के पास कोई ज़मीन नहीं थी। इसलिए राजीव बिट्टू रांची  में स्थित एक ब्लॉक  ओरमांझी में लीज पर खेती करने लगे। अब राजीव CA करने के बावजूद भी खेती करना चाहते थे। वह बस किसानों की अहमियत को समझाने के लिए CA की नौकरी को छोड़ खेती के काम में उतरे थे। राजीव का मनना है कि किसान हर मौसम में कडी़ मेहनत करता है, तब ही हम अपने घर में चैन से खाना खा पाते हैं। राजीव अपने परिवार और अपने बच्चों को यही एहसास करवाना चाहते थे कि हम जो भी खाते हैं वह किसान की कड़ी मेहनत का ही नतीजा होता है।

पहले इकठ्ठी की जानकारी

राजीव पेशे से CA थे इसलिए उनको खेती की ज़्यादा जानकारी नहीं थी। उन्होंने पहले खेती की जगह-जगह से पूरी जानकारी इकट्ठी की। उसके बाद कृषि विभाग में भी जा कर वहाँ के शिक्षकों से सलाह ली और कौन-सी खेती किस प्रकार होती है इस बात की भी पूरी जानकारी इकठ्ठी की। उसके बाद उन्होंने खेती के लिए ज़मीन की तलाश करनी शुरू की क्योंकि उनके पास अपनी ज़मीन नहीं थी। रांची से 28 किलोमीटर की दूरी पर उन्होंने एक किसान से उसकी सभी शर्त्तों और नियम को मान कर 10 एकड़ ज़मीन को लीज पर लिया। उस किसान ने शर्त रखी थी कि उसकी खेती से हुए लाभ में से 33 फीसदी की भागीदारी उसको चाहिए। राजीव ने उसकी बात मानी और खेती की शुरूआत कर दी।

राजीव ने शुरूआत करते हुए सबसे पहले 7 एकड़ में जैविक उर्वरक का उपयोग कर खरबूज और तरबूज को उगाया जिसमें उन्होंने लगभग 2.50 लाख रुपए ख़र्च किए। उनके कठिन परिश्रम और मेहनत से उन्हें सफलता प्राप्त हुई। उनकी फ़सल कुल 19 लाख रुपए की बिकी, जिसमें से राजीव ने बताया की उन्हें लगभग 7-8 लाख का मुनाफा हुआ। इस सफलता से उनका मनोबल और बढ़ गया और आगे और भी फसलों को उगाने लगे।

एक करोड़ सालाना का रखा लक्ष्य

राजीव फिलहाल खेती के अलग-अलग तरीके खोजने लगे हैं। ऐसी फसलों के बारे में जानकारी इक्ठ्ठी कर रहे हैं जिसमें जोखिम कम हो। राजीव ने खेती के काम को संभालने के लिए 45 मज़दूर भी रखे हुए हैं जो खेती के काम को देखते हैं। राजीव का सपना है कि इस खेती के काम को सालाना 1 करोड़ तक पहुँचा दिया जाए। इसके उन्होंने 13 एकड़ ज़मीन लीज पर ली और उस पर खेती करनी शुरू कर दी। राजीव बताते हैं कि साल 2016 में उन्हें खेती के काम से 40-50 लाख का कारोबार किया था।

राजीव अपने मुनाफे से खेती को आगे बढ़ाते हुए कुचू गाँव में भी 3 एकड़ ज़मीन लीज पर ली और उनमें सब्जियाँ उगाने लगे। राजीव का सपना पूरा हुआ अब उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ का हो गया। परंतु अब उन्हें मौसम की चिंता सताती रहती है कि अगर इलाके में सूखा पड़ा या ज़्यादा बारिश के कारण बाढ़ आई तो दोनों हीं स्थिति में घाटा होगा। इस स्थिति से निपटने के लिए राजीव लगातार खेती के जानकारों से संपर्क करते रहते हैं।

दोस्तों का भी मिला सहारा

37 वर्षीय देवराज और 33 वर्षीय शिवकुमार नाम के राजीव के दो करीबी दोस्त हैं, जो उनकी खेती में मदद करते हैं। राजीव ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग की मदद से करते हैं खेती। इससे उन्हें खेती में अधिक मुनाफा होता हैं। राजीव एक NGO भी चलाते हैं जिसका नाम “अंकुर रूरल एंड ट्राईबल डेवलपमेंट सोसाइटी”  है। यह NGO ग्रामीण लोगों की खेती के बारे में जागरूक करती है। ताकि लोग आधुनिक तरीके से खेती कर सकें और मुनाफा कमा सकें।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Dhara Patel

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