खुशी की तलाश में छोड़ा कॉर्पोरेट जॉब, गरीब-आदिवासी बच्चों के लिए अपने गांव में खोला स्कूल

खुशी की तलाश में छोड़ा कॉर्पोरेट जॉब, गरीब-आदिवासी बच्चों के लिए अपने गांव में खोला स्कूल

स्कूल में कोई प्रॉब्लम हो जाए तो आपका बच्चा उसका सॉल्यूशन कैसे ढूंढता है?

  1. घर आकर आपसे बात करता है।
  2. स्कूल में किसी टीचर से बात करता है।
  3. किसी से कुछ नहीं कहता।
  4. खुद ही समस्या का हल ढूंढता है।

ज्यादातर पेरेंट्स का जवाब 1, 2 या 3 हो सकता है। बहुत कम पेरेंट्स होंगे, जिन्होंने 4 चुना होगा।

मध्य प्रदेश के सिवनी में अग्रणी पब्लिक स्कूल के बच्चे ऐसा नहीं करते। वे अपनी समस्या की लिस्ट तैयार करते हैं। उसकी चर्चा बाकायदा छात्र संसद में करते हैं और समस्या का सॉल्यूशन ढूंढकर निकालते हैं। उनकी यह संसद लोकसभा के मॉडल जैसा है। हर साल नई छात्र संसद का गठन होता है। इससे ज्यादा से ज्यादा बच्चों को इसमें भाग लेने का मौका मिलता है। छात्र संसद में स्कूल की समस्याओं को रखा जाता है। सांस्कृतिक और सामाजिक दोनों तरह की योजनाएं तैयार होती हैं। स्कूल के शिक्षक अपने सुझावों से उनकी सिर्फ मदद करते हैं। विपक्ष का काम स्कूल से जुड़ी किसी भी तरह की समस्याओं को उठाना होता है।

कॉर्पोरेट जॉब में पैसा बहुत है, लेकिन संतोष नहीं

इस स्कूल के फाउंडर हैं गौरव जायसवाल। वे पेशे से नेटवर्क इंजीनियर हैं। इस स्कूल को खोलने के लिए उन्होंने अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी। आज वे गरीब आदिवासी बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। बच्चों को पढ़ाई के साथ देश के संवैधानिक ढांचे को समझा रहे हैं। इसके साथ गौरव आसपास के गांवों में पंचायती राज को पुख्ता करने के लिए काम कर रहे हैं। इन कामों में उन्होंने स्थानीय युवाओं को जोड़ा है, जो आंगनवाड़ी, मिड-डे मील और मनरेगा के कामों पर फोकस करते हैं।

गौरव कहते हैं कि कॉर्पोरेट कंपनी में पैसा बहुत है, लेकिन संतोष और खुशी नहीं। मैं खुशी की तलाश में था। समाज में बदलाव करना चाहता था। इसलिए जॉब छोड़ दिया। मेरा मकसद बच्चों को केवल शिक्षा देना नहीं है। मैं यंग माइंड को डेमोक्रेसी की सही डेफिनेशन सिखाना चाहता हूं।

गांव में लाइब्रेरी खोली, लेकिन कोई पढ़ने नहीं आया

गौरव ने मध्यप्रदेश के सिवनी से 12वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद ग्रेजुएशन के लिए भोपाल आए, जहां से उन्होंने इंजीनियरिंग की। पढ़ाई के बाद उन्होंने देश के कई हिस्सों में नेटवर्क इंजीनियर के तौर पर काम किया। कहते हैं– जब मैं देश के अलग-अलग हिस्सों में घूम-घूमकर नौकरी कर रहा था, तब मुझे समाज में असमानता नजर आई। इसी ने मेरे मन में शिक्षा के लिए काम करने का बीज बोया।

एक बार सड़क किनारे चाय की दुकान पर राजनीतिक मुद्दों पर बहस चल रही थी। उस बहस के दौरान मैंने महसूस किया कि अच्छी शिक्षा की कमी किस तरह बच्चों का भविष्य खराब कर सकती है। देश का एक तबका आज भी है, जो महंगी शिक्षा की वजह से अपने अधिकार से वंचित है। समाज में समानता लाने की शुरुआत शिक्षा से ही संभव है। इसी प्रयास में मैंने साल 2009 में गांव में लाइब्रेरी शुरू कर एक छोटी पहल की, लेकिन वहां कोई पढ़ने नहीं आया।

अंग्रेजी और टेक्नोलॉजी का महत्व समझाना चाहता था

गांव में शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था। इस बात को गौरव समझते थे। उन्होंने हार नहीं मानी। ठीक एक साल बाद उन्होंने आंगनवाड़ी मॉडल की शुरुआत करने की सोची। इस तरह ‘नींव’ नाम से आंगनवाड़ी मॉडल की शुरुआत हुई। इस पहल से उन्हें समझ में आया कि सोच को काम में कैसे बदला जा सकता है। कुछ दिनों बाद उन्होंने ‘शिक्षालय’ की शुरुआत की।

गौरव बताते हैं– मैं अपने गांव के युवाओं को अंग्रेजी और टेक्नोलॉजी का महत्व समझाना चाहता था। ‘शिक्षालय’ के जरिए स्कूली बच्चों के लिए एक सीखने की एक जगह बनाई है, ताकि बच्चे खाली समय में कुछ एक्टिविटी कर पाएं। उन्होंने अंग्रेजी से लेकर टेक्नोलॉजी तक सभी चीजें सिखानी यहां शुरू कीं। इसका परिणाम यह रहा कि गांव के बच्चों ने मनरेगा में रहे फर्जीवाड़े को पकड़ लिया।

साल 2014 में शिक्षालय के बच्चों और वॉलंटियर्स ने मिलकर सोशल ऑडिट किया। जिसमें 20 करोड़ के फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। जो चीजें कागज में दिखाई गईं थी और हकीकत में हुई नहीं थी, उन कामों को रातों-रात कराया गया। हजारों ग्रामीण आदिवासियों का रुका हुआ पैसा वापस मिल गया था।

अग्रणी- द डेमोक्रेटिक स्कूल की शुरुआत

साल 2014 में गांव में गौरव ने अग्रणी पब्लिक स्कूल खोला। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। उनका मानना है कि शिक्षा में बदलाव की जरूरत है। अग्रणी एक तरह का कम्यूनिटी स्कूल है। जहां पढ़ने वाले बच्चे, उनके माता-पिता और टीचर्स मिलकर हर सुविधा का ध्यान रखते हैं। अग्रणी स्कूल डेमोक्रेटिक सिस्टम को फॉलो करता है। यहां छात्र संसद को प्रत्यक्ष रुप में लागू किया गया है। बच्चे अपनी दिक्कतों को संसद में उठाकर उसका समाधान भी करते हैं।

अग्रणी में अलग-अलग ज्ञानमेला का आयोजन भी किया जाता है। गौरव बताते है कि हमारे स्कूल के बच्चों ने NCERT की किताब में बिरसा मुंडा के लिए लिखे गए शब्दों पर आपत्ति जताई। इसका परिणाम यह रहा कि NCERT ने उस आपत्ति को माना और सिलेबस में सुधार किया। अग्रणी के जरिए गौरव न सिर्फ यहां के बच्चों को शिक्षा का महत्व सिखा रहे हैं, बल्कि उन्हें constitutional citizen बना रहे हैं। ऐसा करने से बच्चे अपने हक और अधिकार को समझकर खुद की आवाज उठा सकते हैं।

अब तक गौरव अपनी इस पहल से लगभग तीन लाख बच्चों को शिक्षित कर चुके हैं और 15 हजार टीचर्स को वर्कशॉप के जरिए ट्रेनिंग दे चुके हैं। वे अब तक 17 राज्यों और 20 भाषाओं के स्कूल में भी काम कर चुके हैं।

विदेश से मिली फैलोशिप

सोशल वर्क के लिए गौरव को कई अंतरराष्ट्रीय फैलोशिप मिली हैं। Swedish Institute of Young Connectors of Future के तहत वे अमेरिका और नार्थ फिनलैंड में रहे और वहां की शिक्षा व्यवस्था को देखा समझा। वहीं से लौटकर उन्होंने अपने गांव-समुदाय को शिक्षा से जोड़कर कुछ बदलाव की कोशिश जारी रखी है। संयुक्त राष्ट्र संघ के SDG उद्देश्यों के तहत सिंगापुर का भी एजुकेशनल टूर किया।

किसान सत्याग्रह से भी जुड़े हैं

गौरव शिक्षा के साथ किसानों के लिए मुहिम चला रहे हैं। किसान सत्याग्रह के जरिए उनके मुद्दों को सरकार तक पहुंचाते हैं। गौरव का मानना है कि शिक्षा को जब तक राजनीतिक नहीं बनाया जाएगा, तब तक उसमें समानता नहीं आएगी। इसी सोच के साथ उन्होंने शिक्षा सत्याग्रह की भी पहल की है।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Dhara Patel

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