इस इंजीनियर ने बनाई कम लागत वाली मशीन, जो बंजर ज़मीन को घंटों में बनाती है खेती के योग्य

इस इंजीनियर ने बनाई कम लागत वाली मशीन, जो बंजर ज़मीन को घंटों में बनाती है खेती के योग्य

अधिकांश लोगों के लिए शिक्षा सिर्फ पैसा कमाने और आगे बढ़ने का जरिया है। लेकिन 25 साल के दीपक ऐसा नहीं सोचते। उनके अनुसार शिक्षा का फायदा तभी है, जब वह किसी जरूरतमंद के काम आ सके। अपनी इस सोच के चलते दीपक ने इंजीनियरिंग करने के बाद नौकरी की राह नहीं पकड़ी बल्कि किसानों के लिए एक ऐसी किफायती हार्वेस्टिंग मशीन बनाने में जुट गए, जिससे उनकी बंजर पड़ी सैंकड़ों एकड़ जमीन को खेती के योग्य बनाया जा सके।

साल 2016 में जब के. दीपक रेड्डी, हैदराबाद से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएशन करने के बाद अपने पैतृक गांव लौटे, तो उनके मन में खेत और किसानी से जुड़े अनगिनत सवाल थे। वह तेलंगाना के संगारेड्डी जिले के गांव बोरांचा में रहते हैं। गांव में ऐसे ही घूमते हुए, अचानक उनकी नजर एक खाली जमीन पर पड़ी। वह कहते हैं, “हालांकि मैं बचपन से इस खाली जमीन को देखता आ रहा था। लेकिन बार-बार यहां जाने के बाद मुझे पता चला कि सालों से इस पर खेती नहीं की गई थी।”

दीपक ने बताया, “जब मैंने आसपास के किसानों से पूछा कि ये सैकड़ों एकड़ जमीनें सालों से बंजर क्यों पड़ी हैं? तब उन्होंने बताया कि पत्थरों के मलबे के कारण वहां खेती कर पाना संभव नहीं है। ज़मीन से पत्थरों को हटाने में काफी खर्च आता है। पहले जमीन को साफ करने के लिए पैसे लगाओ और फिर खेती पर, इतना खर्च उठा पाना उनके लिए संभव नहीं है। पांच-सात एकड़ जमीन पर खेती करने वाला सीमांत किसान इस पर हजारों रुपये खर्च नहीं कर सकता।”

बंजर ज़मीन से पत्थरों को साफ करना आसान नहीं

दीपक बताते हैं, “किसान अगर इस जमीन पर पैसे लगाने के लिए तैयार हो भी जाएं, तब भी इन पत्थरों और चट्टानों को खेत से पूरी तरह हटाने में उन्हें कम से कम पांच या छह साल तक इस पर लगातार काम करना पड़ेगा। सतह की परत में 60 प्रतिशत तक पत्थर होते हैं। इन्हें जमीन की जुताई के कई चक्रों के जरिए हटाने में और कई साल लगते जाते हैं।” यह काम केवल गर्मियों के महीनों में ही किया जा सकता है। क्योंकि इस समय मिट्टी सूखी होती है।

दीपक ने जब शोध करना शुरू किया, तो पता चला कि महाराष्ट्र कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के आस-पास के राज्यों में ऐसी हजारों एकड़ जमीन खाली पड़ी है। वह कहते हैं, “ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं था। अन्य देश भी इस समस्या से जूझ रहे थे। इससे निपटने के लिए उनके पास मशीनें थीं। लेकिन भारत में कम लागत वाला कोई भी ऐसा उपकरण नहीं था, जो इस काम को अंजाम दे सके।”

खास काम को अंजाम देने वाली साधारण सी मशीन

कई साल की मेहनत और शोध के बाद उन्होंने इस काम के लिए एक कम कीमत वाली मल्टी हार्वेस्टर मशीन तैयार की। जो ना केवल कुछ घंटों में पत्थरों को खोदकर बाहर निकाल फेंकती है, बल्कि आलू प्याज और अन्य जड़ वाली सब्जियों की खुदाई भी बड़ी सफाई के साथ करती है।

दीपक, ग्रेजुएशन के बाद सिमुलेशन और सॉफ्टवेयर डिजाइनिंग सीखकर अपनी स्किल्स को अपग्रेड कर रहे थे। वह बताते हैं, “मैंने अपनी स्किल्स का इस्तेमाल करते हुए एक ऐसी मशीन बनाने का फैसला किया, जिसे ट्रैक्टर के साथ जोड़ा जा सके और मिट्टी की ऊपरी परत के साथ-साथ नीचे से भी पत्थरों को हटाने में सक्षम हो।”

26 साल के दीपक, हार्वेस्टर बनाने के लिए लगातार कई सालों तक काम करते रहे। वह कहते हैं, “मेरा विचार एक ऐसी मशीन बनाने का था, जो भारतीय किसानों के लिए हर मायने में बेहतर हो, जिसमें सारी जरूरी सभी सुविधाएं हो और उसकी लागत भी कम हो। फिर मैंने सोचा कि अगर यह मशीन आलू और जड़ वाली सब्जियों की भी कटाई कर पाई, तो ज्यादा बेहतर रहेगा। इससे मशीन की उपयोगिता बढ़ जाएगी।”

दिनों के काम के लिए अब बस चंद घंटे

दीपक ने ट्रैक्टर में जोड़कर खींचे जाने वाले उपकरण की अवधारणा पर काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि मशीन के निचले हिस्से में लगा ब्लेड मिट्टी को खोदकर पत्थरों को बाहर निकालता है। यह खास तकनीक पत्थर और मिट्टी को अलग करती जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में मिट्टी छनकर खेत में वापस गिरती रहती है, जबकि पत्थर मशीन में लगी स्टोरेज बास्केट में इकट्ठा होते रहते हैं।

आलू और सब्जियों को भी इसी तरह से खुदाईकर मिट्टी से छानकर अलग कर दिया जाता है। यह मल्टी हार्वेस्टर ना केवल किफायती है, बल्कि मेहनत और समय दोनों बचाता है। वह कहते हैं, “एक खेतिहर मजदूर एक एकड़ जमीन से पत्थर हटाने में पूरा दिन लगा देता है। इस काम के लिए वह 5000 रुपये मजदूरी लेता है। लेकिन मेरी यह मशीन इस काम को सिर्फ चार घंटे में पूरा कर सकती है। इस पर तकरीबन 1500 रुपये का खर्च आएगा।”

मशीन, जमीन से सब्जियों की खुदाई भी बेहद आसानी और तेजी से करती है। वह बताते हैं, “मौसम की शुरुआत में किसान जितनी जल्दी अपनी फसल बाजार में लेकर जाएंगे, उतना ज्यादा मुनाफा होगा।” इंजीनियर अब तक 5 एकड़ चट्टानी इलाके को साफ कर उसे खेती करने लायक बना चुके हैं। उनका लक्ष्य अगले साल तक 25 यूनिट बेचकर, इस संख्या को बढ़ाकर 500 एकड़ करने का है।

तुर्की से आई मशीन से बेहतर है यह मशीन

नारायणखेड़ जिले के कांगती गांव के किसान संतोष राजपूत ने कहा, “मैंने दीपक के हार्वेस्टर का ट्रायल लिया है। यह शानदार काम करता है। मेरे पास 30 एकड़ जमीन है। लेकिन सिर्फ 15 एकड़ जमीन पर ही खेती कर पाता हूं। बाकी की जमीन पर पत्थर और चट्टानें हैं। अगर मैं उस पर फसल उगाने की कोशिश भी करूं, तो गर्मी के दिन में पत्थर गर्म हो जाते हैं और उच्च तापमान के कारण पौधे मर जाते हैं।”

संतोष ने बताया कि गांव के एक किसान ने इस काम के लिए तुर्की से ऐसी ही एक मशीन मंगवाई थी। उसकी कीमत 12 लाख रुपये थी। फिर भी रिज़ल्ट इतना अच्छा नहीं रहा। दीपक की बनाई मशीन उससे काफी ज्यादा बेहतर है और इसकी कीमत भी सिर्फ तीन लाख रुपये है। वह कहते हैं, “अगर किसान चाहें, तो मिलकर इसे खरीद सकते हैं या फिर किराये पर ले सकते हैं।”

नहीं मिली जगह, तो गराज में करते थे काम

मशीन को बनाना दीपक के लिए आसान नहीं था। इसे बनाने में पूरे चार साल का समय लगा है। वह बताते हैं, “मेरे पास ऐसा कोई साथी या टीम नहीं थी, जिसकी मैं मदद ले सकूं। मैंने अकेले ही सारा काम किया और जो भी समस्या सामने आई उनसे अकेले ही निपटा हूं। पैसे की भी तंगी थी। मैंने अपने परिवार वालों और दोस्तों से 4.5 लाख रुपये उधार लिए थे।” दीपक जानते थे कि अगर उनकी मशीन ठीक तरह से काम कर गई तो आर्थिक समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी।दीपक के पास काम करने के लिए कोई जगह भी नहीं थी। पहले अपने खेत में पेड़ के नीचे बैठकर और फिर बाद में अपने एक दोस्त के गराज में जाकर इस पर काम किया था।

उन्होंने बताया, “मैंने अपने चौथे प्रोटोटाइप के साथ 90 प्रतिशत सफलता प्राप्त कर ली थी और तेलंगाना स्टेट इनोवेशन सेल और मेक रूम इंडिया की पहल, i2E लैब के लिए आवेदन किया। सलाहकारों ने मुझे व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य उत्पाद बनाने में मेरी मदद की और मुझे निधि प्रयास से 10 लाख रुपये की अनुदान राशि भी दिलाई। मुझे अपना स्टार्टअप, “भौम्या इनोवेशन” लॉन्च करने की इजाजत मिल गई थी।”

दीपक के मेंटर, मेक रूम इंडिया के संस्थापक और प्रमुख प्रणव हेब्बार कहते हैं, “इस कार्यक्रम का उद्देश्य दीपक जैसे उद्यमियों की पहचान करना है, खासतौर पर टियर-II और टियर-III शहरों से। ये जमीनी स्तर पर समस्याओं को हल करने की क्षमता रखते हैं।” प्रणव आगे बताते हैं, “मोटे तौर पर देखें तो अकेले संगारेड्डी, मेडक, कामारेड्डी और निजामाबाद क्षेत्र में लगभग 1000 एकड़ जमीन पर पत्थर का मलबा पड़ा है। इस जमीन पर खेती नहीं की जा सकती। महाराष्ट्र और कर्नाटक के नांदेड़ बीदर और अन्य पड़ोसी जिलों में ऐसे ही 2000 एकड़ जमीन बेकार पड़ी हैं।”

कभी असफल होने का ख्याल नहीं आया?

प्रणव के अनुसार, इस तरह के उपकरणों के इस्तेमाल से किसानों की खेती योग्य जमीन को बढ़ाया जा सकता है, जो समय के साथ वैसे ही सिकुड़ती जा रही है। इससे वे बेहतर कमाई कर सकते हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या मशीन बनाते समय असफल होने का विचार कभी मन में आया था?

दीपक कहते हैं, “जोखिम उठाने का निर्णय लेना थोड़ा मुश्किल था। ग्रेजुएशन के बाद नौकरी करना जरूरी था। क्योंकि करियर के बनने या बिगड़ने में शुरुआती साल महत्वपूर्ण होते हैं। लेकिन मैंने कभी असफलता के बारे में नहीं सोचा। मेरा इरादा व्यावसायिक लाभ के लिए मशीन बनाने का नहीं था। मैं तो किसानों की मदद करना चाहता था। शिक्षा का फायदा तभी है, जब वह किसी जरूरतमंद के काम आ सके।”फिलहाल उन्हें उम्मीद है कि उनका यह उत्पाद जल्द ही मार्केट में आ जाएगा और पूरे भारत में व्यावसायिक रूप से इसे इस्तेमाल किया जाने लगेगा।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Dhara Patel

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