7वीं पास लोहार का आविष्कार, स्टोव के साथ बनाया ड्रायर, बच सकती है 80 फीसदी ऊर्जा

आज पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण को लेकर हाय-तौबा मची हुई है। भारत में भी, खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में आबोहवा इतनी खराब हो चुकी है कि लोगों को फेफड़ों से जुड़ी कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

मणिपुर के इम्फाल में रहनेवाले मैबम देबेन सिंह के साथ भी ऐसी ही एक घटना हुई। लेकिन मुश्किल हालातों में देबेन ने टूटने के बजाय, इस परेशानी का हल ढूंढने पर फोकस किया और एक ऐसी मशीन बनाई, जिससे न सिर्फ खाना बनाने के दौरान प्रदूषण का स्तर कम हो सकता है, बल्कि पैसों की बचत भी हो सकती है।

दरअसल, साल 2011 में देबेन को पता चला कि उनकी बहन को लंग कैंसर हो गया है। डॉक्टरों ने देबेन को सख्त सलाह दी कि उन्हें अपनी बहन को धुएं से किसी भी हाल में बचाना होगा, नहीं तो उनके लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है।

यह सुनकर देबेन काफी बैचेन हो गए। उस वक्त उनके घर की हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि वह एलपीजी सिलेंडर का खर्च उठा पाएं। लेकिन पेशे से लोहार देबेन ने अपनी बहन को धुएं से बचाने के लिए एक तरकीब निकाली और कुछ दिनों में ही लकड़ी या चारकोल से जलने वाला एक ऐसा चूल्हा बनाया, जिसमें धुआं बिल्कुल नहीं होता।

किसी को नहीं थी खबर

देबेन, बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अपने माता-पिता को सहारा देने के लिए उन्होंने सातवीं के बाद, अपनी पढ़ाई छोड़ दी और राज्य सरकार के एक जीप के ड्राइवर के रूप में काम करने लगे।

करीब तीन दशकों तक यह काम करने के बाद, उन्होंने एक लोहार के रूप काम करना शुरू किया।

साल 2011 में बायोमास चूल्हे के जुगाड़ को लेकर उन्होंने बताया, मेरी बहन का इलाज कर रहे डॉक्टरों से मुझे पता चला कि पारंपरिक चूल्हे के कारण राज्य में हर साल सैकड़ों महिलाएं लंग कैंसर की चपेट में आती हैं। यह सुनने के बाद, मैं काफी परेशान हो गया और कुछ ऐसा करने का फैसला किया, जिससे मेरी बहन के साथ-साथ, दूसरी महिलाओं को भी इस समस्या से बचाया जा सके।”

हालांकि, जब देबेन ने इस दिशा में काम शुरू किया, तो किसी को इसके बारे में कुछ भी पता नहीं था। कुछ दिनों बाद, जब उनका स्टील और एलुमिनियम से बना पहला प्रोटोटाइप तैयार हो गया, तो उन्होंने इसके बारे में अपने बेटे थोईथोई को बताया।

थोईथोई भी इस स्टोव की अहमियत को तुरंत समझ गए और उन्होंने इसे ‘एमियोनू स्टोव’ नाम देते हुए, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से संपर्क किया। फिर, करीब सालभर बाद देवेन को अपने स्टोव को प्रदर्शित करने के लिए दिल्ली बुलाया गया।

एक पंथ दो काज

देबेने जब राष्ट्रपति भवन में अपने बायोमास स्टोव को प्रदर्शित कर रहे थे, तो उन्होंने उसे एक प्लास्टिक के टेबल पर रखा था। लेकिन स्टोव की निचले हिस्से से इतनी गर्मी निकल रही थी कि टेबल पिघल गया। उन्हें इस समस्या का थोड़ा सा भी अंदाजा नहीं था।

फिर, उन्होंने इसे एक लकड़ी पर भी रख कर देखा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। ज्यादा ताप के कारण लकड़ी भी जलने लगा। तब उन्होंने सोचा कि क्यों न ढांचे में थोड़ा बदलाव करके इस स्टोव को एक ड्रायर के रूप में भी इस्तेमाल में लाया जाए।

इसलिए स्टोव के निचले हिस्से में उन्होंने एक स्टील का ट्रे लगा दिया।

देबेन कहते हैं, “मणिपुर के लोग ड्राई फिश और ड्राई सब्जी का काफी इस्तेमाल करते हैं। लोगों को खाने को ड्राई करने के लिए अलग से मशीन लेनी पड़ती है और कई लोगों को सीधे बाजार से ही खरीदना पड़ता है। इसलिए हमें लगा कि शायद इससे लोगों को मदद मिल सकती है।”

इस तरह आविष्कार हुआ पहले Cooking Cum Drying Stove का। देबेन के इस इनोवेशन के लिए साल 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।

क्या हैं फायदे?

इस Cooking Cum Drying Stove का फायदा यह है कि इससे लोगों को खाना बनाने और ड्राई करने के लिए दो अलग-अलग मशीनों को लेने की जरूरत नहीं है। इससे पैसों के साथ-साथ, समय और ईंधन की भी बचत होती है।

देबेन बताते हैं, “इस खास स्टोव को लकड़ी, चारकोल, नारियल के छिलके जैसे कई चीजों पर चलाया जा सकता है। इसमें कम ईंधन के बावजूद, कंपल्शन इतना ज्यादा होता है कि धुएं के लिए कोई जगह नहीं होती है। अगर एलपीजी चूल्हे पर 10 लीटर पानी गर्म होने में 30 मिनट लगते हैं, तो इसमें 15-17 मिनट में ही हो जाएगा। वहीं, परंपरागत चूल्हे की तुलना में इसमें 60 से 80 फीसदी ईंधन की बचत भी होती है।”

वह कहते हैं कि इस पर ड्राई किया हुआ खाना गलता नहीं है और उसे लंबे समय तक प्रीजर्व करके रखा जा सकता है।

दिया बिजनेस का रूप

साल 2017 में राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करते ही, देबेन ने अपने इनोवेशन को एक बिजनेस का रूप देना शुरू कर दिया और Kangleipak Fish Dryer नाम से एक कंपनी को शुरू किया।

फिलहाल, वह अपने सौ से अधिक यूनिट बेच चुके हैं। मौजूदा समय में उनके पास दो तरह के वेरिएंट हैं, एक चूल्हे वाले ड्रायर की कीमत जहां 7.5 हजार रुपये है। वहीं, दो चूल्हे वाले ड्रायर की कीमत 20 हजार रुपये है।

उनके ग्राहकों में राहुल नाओरेम का नाम भी शामिल है, जो इम्फाल में ही एक रेस्टूरेंट चलाते हैं। राहुल कहते हैं, “मैंने देबेन के बारे में फेसबुक पर पढ़ा और उनसे Cooking Cum Drying Stove खरीदने के लिए संपर्क किया। मैं बीते छह महीने से एलपीजी सिलेंडर की जगह इसका इस्तेमाल कर रहा हूं। यह काफी आसान और किफायती है। इसमें कई तरह का खाना एक साथ बनाया जा सकता है।”

कोरोना महामारी से हुई काफी मुश्किल

मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभालने वाले थोईथोई कहते हैं, “कोरोना महामारी के कारण हमारा बिजनेस बुरी तरह से प्रभावित हुआ है और हमारे गिने-चुने उत्पाद ही बिके। हम अपने बिजनेस को आगे बढ़ाना चाहते हैं।”

इस कड़ी में वह एक ऐसे स्टोव को बना रहे हैं, जिसका इस्तेमाल बायोमास के साथ-साथ बिजली के जरिए भी किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए उन्हें काफी मशीनरी की जरूरत है। फिलहाल वे आर्थिक रूप से अपने बिजनेस में निवेश करने के लिए इतने समर्थ नहीं हैं।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

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