बिहार के एक टीचर ने पढ़ाने का ऐसा तरीका निकाला की क्लास भर गई, लोग बोले, ऐसे शिक्षक ही चाहिए

पूर्णिया जिला बिहार में एक टीचर बच्चो को जिस अंदाज़ में पढ़ा रहे हैं, उससे बच्चो का उत्साह बढ़ता ही जा रहा है और बच्चे बड़ा मन लगा कर पढ़ते हैं, और अभिवावक के साथ अन्य लोगो को भी खूब पसंद आ रहा है।

शिक्षक किसे कहते हैं यह शब्द एक वचन और बहु वचन दोनों होता है, एक अध्यापक वो होता है जो बच्चो के अंदर सीखने की अभिलाषा को जगा दे, वही सही मायने में शिक्षक कहलाता है, एक व्यक्ति जो बच्चो के ज्ञान को बढ़ाने उनके अंदर की योग्यता को बहार लाने और साथ ही शारीरिक विकास पर ध्यान देता है उनकी सहायता करता है।

एक शिक्षक को हमेशा निर्देश देना चाहिए न की आदेश देना चाहिए और शिक्षक हमेशा उसके और छात्रों के बीच प्रेम तथा सहयोग का माहौल बनाता है।

एक ऐसा इंसान जो अपना पूरा जीवन अपना पूरा ज्ञान बच्चो के अच्छे भविष्य के निर्माण में उन्हें, अनुशासन, बौद्धिक विकास, शारीरिक विकास, नैतिकता, कुशल व्यव्हार, सहजता सिखाने में लगा देता है। इसीलिये छात्रों को भी चाहिए की वो आपने टीचर से जीवन भर सहजता आदरभाव और सहानुभूति रखें।

आइये हम ऐसे शिक्षक की बात करते हैं, जो इन्ही बातों के अनुरूप शिक्षण का कार्य कर रहे हैं

शिक्षक का नाम सतीश कुमार है, जो की वसंत पंचायत में स्थित शाला जिसका नाम प्राथमिक विद्यालय सुगनी टोला है वह पढ़ाते हैं। उनका पढ़ने का तरीका छात्रों को इतना भा रही है की शाला में छात्रों की संख्या भी बढ़ती जा रही है।

हिंदी वर्णमाला की कविता के रूप में ऐसे पढ़ाया की बच्चो की संख्या लगतार बढ़ गयी

सतीश कुमार के हिंदी वर्णमाला को कविता के माध्यम से सिखाना जैसे त से तरबूज काट रहे थे, थ से थपकी दे रहे हैं, द से दरी बिछा रहे हैं, ध से धक्का लगा रहे हैं, ढ से ढक्कन लगा रहे हैं, साथ में चेहरे के भाव का इस्तेमाल और डांस भी करते जाते हैं और इसी तरीके की वजह से सतीश कुमार जल्द ही बच्चो और लोगो के बीच लोकप्रिय होते चले गए।

टीचर सतीश कुमार के पढ़ाने के इस अनूठे तरीके से बच्चे बहुत मज़े के साथ उत्साहित हो कर पढ़ रहे हैं टीचर सतीश कुमार बताते हैं की शाला में अभी 160 बच्चे हैं, जबकि पहले 40 से 50 बच्चे ही आते थे, पर उन्होंने पढ़ाने तरीका बदला जिस से बच्चो में लगता बढ़ोत्तरी होती जा रही है।

शाला के पास अपनी खुद की ईमारत नहीं है और न ही बच्चो के बैठने के लिए डेस्क और चेयर्स

भारत में विद्यालय को ज्ञान का मंदिर भी कहा जाता है। जहाँ बच्चे ज्ञान पाते हैं, जहाँ छात्रों के शारीरिक मानसिक और बौद्धिक स्तर पर विकास होता है जो की राष्ट्र निर्माण में सहायकों होता है, जहाँ चारो तरफ ज्ञान ही ज्ञान का खज़ाना भरा होता है।

विद्यालय बच्चो को संस्कारी के साथ साथ शिक्षित बनाते हैं, जो उन्हें एक अच्छे और सफल इंसान बन ने में मदद करता है, विद्यालय की शिक्षा से ही बच्चे रोजगार के अवसर को पहचान ने लगते हैं किसी को डॉक्टर बन ना है, कोई इंजीनियर बन ना चाहता है, कोई शिक्षक, तो कोई वैज्ञानिक बन ना चाहते हैं। साथ ही कुछ लोग व्यापारिक और औद्योगिक शिक्षा भी लेते हैं।

सुगनीटोला प्राथमिक विद्यालय में लगभग 150 छात्र रजिस्टर्ड हैं और पहले एक ही टीचर इन बच्चो को पढ़ाते थे। शिक्षक सतीश कुमार के आने के बाद दो टीचर हो गए और ये दोनों मिल कर सरे बच्चो की ज़िम्मेदारी लिए हुए हैं और उनका भविस्य तैयार कर रहे हैं।

सतीश कुमार रहनेवाले तो पूर्णिया के हैं, लेकिन बच्चो की पढाई में विलम्ब माँ हो उनकी वजह से उन्होंने शाला के पास रुपौली में किराये पर कमरा ले लिया।

प्राथमिक विद्यालय सुगनीटोला की खुद की ईमारत और कुर्सी टेबल नहीं है, ऐसे में बच्चो को पढ़ाना कितना कठिन हैै। उसके बाद भी सतीश कुमार के पढ़ाने के निराले अंदाज़ के कारण बच्चे ख़ुशी से घर से बैठने की दरी या चादर ले कर पहुँचते हैं। बच्चे अपनी कक्षा में एक दिन का नागा भी नहीं करते।

अब ये शाला मध्य विद्यालय चपहरि के एक भवन में स्थानांतरित कर दी गयी है, जो की लगभग चार किलोमीटर दुरी पर स्थित है, इस भवन में दो और प्राथमिक विद्यालय के साथ कुल अब तीन शालाएं चल रही हैं।

अध्यापक सतीश कुमार ने सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सामने आयी। हर स्थिति को समझते हुए और साथ ही बच्चो के भविष्य को देखते हुए हर कमियों को किनारे करते हुए कुछ नया करने की ठानी और हर एक कठनाईओं को अवसर में बदलते हुए कार्य किया। ऐसे शिक्षक के जज़्बे को सलाम करते हैं, जो गुरु होने का सही कर्तव्य निभा रहे हैं। राष्ट्र हित में कर्म कर रहे हैं।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok mantra से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है.]

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