जापान की नौकरी छोड़ भूपेश ने 5 साल पहले किसानों के लिए ‘वैल्यू एडिशन मॉडल’ पर स्टार्टअप शुरू किया, हर महीने 40 लाख रु. टर्नओवर

जापान की नौकरी छोड़ भूपेश ने 5 साल पहले किसानों के लिए ‘वैल्यू एडिशन मॉडल’ पर स्टार्टअप शुरू किया, हर महीने 40 लाख रु. टर्नओवर

आम तौर पर किसानों की शिकायत रहती है कि उन्हें खेती से कमाई नहीं होती है। लगातार मेहनत करने और भरपूर प्रोडक्शन के बाद भी लागत के मुकाबले आमदनी बहुत कम होती है। दरअसल इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ये है कि किसानों के प्रोडक्ट में वैल्यू एडिशन (एक ही प्रोडक्ट से क्वालिटी बेस्ड कई नए-नए प्रोडक्ट बनाना) की कमी। इसकी वजह से उन्हें सही कीमत नहीं मिल पाती है। चंडीगढ़ में रहने वाले भूपेश सैनी ने इस परेशानी को दूर करने के लिए एक पहल की है।

भूपेश देशभर के किसानों से उनकी उपज और प्रोडक्ट खरीदते हैं और फिर उसका वैल्यू एडिशन करके मार्केटिंग करते हैं। इससे उनकी कमाई तो होती ही है, साथ ही किसानों को भी उनकी उपज की अच्छी कीमत मिलती है। उनके साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों किसान जुड़े हैं। फिलहाल इससे वे हर महीने 40 लाख रुपए का टर्नओवर हासिल कर रहे हैं।

39 साल के भूपेश ने 2005 में MBA की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद मार्केट रिसर्च की फील्ड में उनकी जॉब लग गई। लंबे समय तक उन्होंने इस फील्ड में काम किया। इस दौरान उन्हें भारत के बाहर भी जाने का मौका मिला। साउथ कोरिया और जापान में कई बड़े प्रोजेक्ट पर उन्होंने काम किया।

गांव में बच्चे गुड़ के बड़े ढेले नहीं खा पा रहे थे, तब इससे कैंडी बनाने का ख्याल आया

भूपेश कहते हैं कि जब कभी छुट्टियों में हम गांव आते थे तो गुड़ खाने को मिलता था। बच्चों को भी गुड़ बहुत पसंद था, लेकिन एक दिक्कत ये थी कि गुड़ के ढेले का साइज बड़ा होता था। कई बार तोड़ने पर भी वे आसानी से टूटते नहीं थे। इस वजह से कई लोग गुड़ नहीं खा पाते थे, खास करके बच्चे। तब मेरे दिमाग में ख्याल आया कि बच्चों को कैंडी बहुत पसंद होता है। अगर हम गुड़ को कैंडी के रूप में बदल पाएं तो इसे तोड़ने की परेशानी भी खत्म हो जाएगी और बच्चे भी चाव से खा सकेंगे।

फिर क्या था, 2016 में भूपेश जापान की नौकरी छोड़कर भारत लौट आए। यहां उन्होंने कई गांवों का दौरा किया, किसानों से मिले। गुड़ बनाने की प्रोसेस को समझा। इसके बाद गुड़ से कैंडी तैयार करने का काम उन्होंने शुरू किया। चूंकि वे इस फील्ड में नए थे और पहले से इस तरह के कॉन्सेप्ट पर काम नहीं हुआ था। लिहाजा उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। एक स्टैंडर्ड कैंडी तैयार करने में उन्हें दो साल का वक्त लग गया।

कैंडी बनाकर शहर में दुकानदारों के यहां रखने जाते थे

भूपेश कहते हैं कि तब हम घर पर ही कैंडी तैयार कर रहे थे। इसमें घर के लोग मेरी मदद करते थे। मार्केटिंग के लिए हम दुकानदार के पास जाते थे और उनसे कहते थे कि आप इसे रख लीजिए। कुछ दुकानदार तैयार होते थे तो कुछ सीधे मना भी कर देते थे। इसी तरह कुछ दिनों तक हमारा काम चलता रहा। शहर में एक दुकान से दूसरी दुकान तक हम कैंडी पहुंचाने की कोशिश करते रहे। धीरे-धीरे लोगों को हमारे प्रोडक्ट पसंद आने लगे और बढ़िया मुनाफा होने लगा।

कुछ दिनों बाद भूपेश के बचपन के दोस्त नवदीप खेड़ा भी उनके साथ जुड़ गए। दोनों ने मिलकर ‘हाउस ऑफ फार्मर्स’ नाम से खुद की कंपनी रजिस्टर की और अपनी वेबसाइट के जरिए देशभर में मार्केटिंग करने लगे। एक के बाद एक उन्होंने अलग-अलग वैराइटीज और फ्लेवर में कैंडी तैयार की। इससे उनकी अच्छी-खासी पहचान बन गई। जैसे-जैसे किसानों को उनके बारे में जानकारी होती गई, वे भी उनसे जुड़ने की दिलचस्पी दिखाने लगे।

कोविड में रफ्तार कम हई, लेकिन बिजनेस बढ़ गया

भूपेश कहते हैं कि कोरोना के पहले हमारा काम अच्छा-खासा जम गया था। अच्छी कमाई हो रही थी। ऑनलाइन और ऑफलाइन लेवल पर हम लोग देशभर में मार्केटिंग कर रहे थे, लेकिन कोविड के बाद हमारी रफ्तार थम गई। न तो हम ठीक तरह से प्रोडक्शन कर पा रहे थे और न ही ग्राहकों तक अपने प्रोडक्ट भेज पा रहे थे। इसी बीच उन्नति नाम की एक कोऑपरेटिव सोसाइटी से हमारा कॉन्टैक्ट हुआ। वे लोग किसानों के समूह के साथ मिलकर बैंक एंड लेवल यानी प्रोडक्शन पर काम कर रहे थे, लेकिन मन मुताबिक मार्केटिंग नहीं कर पा रहे थे।

इसके बाद हमने साथ मिलकर ‘आसना’ नाम से एक नया वेंचर शुरू किया। अब हमारे पास न तो प्रोडक्ट की कमी थी और न ही रिसोर्सेज की। गुड़ की कैंडी के साथ ही हमने अलग-अलग वैराइटी की कैंडी, जूस और हर्बल तैयार करके मार्केटिंग शुरू कर दी। इसका हमें फायदा हुआ और हमारा बिजनेस ट्रैक पर लौट आया। कुछ दिनों बाद पंजाब सरकार की संस्था ‘पंजाब एग्रो इंडस्ट्रीज’ भी हमारे साथ मिलकर काम करने लगी। इससे आर्थिक रूप से हमें काफी सपोर्ट मिला।

कैसे करते हैं काम? क्या है बिजनेस मॉडल?

भूपेश कहते हैं कि इस कोऑपरेटिव सोसाइटी में 900 मेंबर्स हैं। इनके माध्यम से देशभर से हजारों किसान हमारे साथ जुड़े हैं। ये किसान जंगलों और अपने खेतों से ओरिजिनल रॉ मटेरियल निकालकर हमारी मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट तक पहुंचाते हैं। इसके बदले हम उन्हें पेमेंट करते हैं।काम की प्रोसेस को लेकर वे बताते हैं कि रॉ मटेरियल कलेक्ट करने के बाद हम वैल्यू एडिशन पर फोकस करते हैं। यानी उसकी प्रोसेसिंग करके नए-नए प्रोडक्ट तैयार करते हैं। इसके बाद उसकी पैकेजिंग और मार्केटिंग का काम होता है।

इसके अलावा ऐसे छोटे किसान या व्यवसायी जो खुद से प्रोडक्ट तो तैयार कर लेते हैं, लेकिन मार्केटिंग नहीं कर पाते हैं, हम ऐसे लोगों को प्रोडक्ट तैयार करने की प्रोफेशनल ट्रेनिंग देते हैं। उनके प्रोडक्ट को सर्टिफिकेशन दिलवाते हैं और फिर उनका वैल्यू एडिशन करते हैं और अपने प्लेटफॉर्म के बैनर तले उसकी मार्केटिंग करते हैं। इससे उन्हें अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है और हमें अलग-अलग वैराइटी के खास प्रोडक्ट मिल जाते हैं।

फिलहाल भूपेश के साथ हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित देशभर से किसान जुड़े हैं। वे दो दर्जन से ज्यादा वैराइटी के प्रोडक्ट तैयार करके देशभर में उनकी ऑनलाइन और ऑफलाइन लेवल पर मार्केटिंग करते हैं। हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर सहित देश के कई राज्यों में 3200 से ज्यादा उनके रिटेल स्टोर्स हैं, जहां उनके प्रोडक्ट मिलते हैं।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok Mantra अपनी तरफ से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है. ]

Dhara Patel

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