UK से ली डिग्री और भोपाल में शुरू की एवोकाडो की नर्सरी, ताकी देश में सस्ता हो यह विदेशी फल

भोपाल, मध्यप्रदेश के 26 वर्षीय हर्षित गोधा साल 2013 में BBA की पढ़ाई के लिए यूके गए थे। फिटनेस के शौक़ीन, हर्षित की हेल्दी प्लेट में हर दिन एवोकाडो रहता ही था और इस तरह यह उनकी डाइट का एक हिस्सा बन चुका था।

लेकिन तब हर्षित ने सोचा भी नहीं था कि यह सुपर फ़ूड न सिर्फ उनकी डाइट का हिस्सा है, बल्कि एक दिन उनका काम भी बन जाएगा।

BBA की पढ़ाई के बाद, हर्षित ने इज़राइल जाकर एवोकाडो उगाना सीखा और आज उन्होंने अपने पांच एकड़ खेत में तक़रीबन 1800 एवोकाडो के पौधे उगाए हैं। इतना ही नहीं वह देशभर के किसानों को भी इज़राइली एवोकाडो के पौधे बेच रहे हैं और अपने पारिवारिक बिज़नेस को छोड़कर आज वह एक किसान बन गए हैं।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए वह कहते हैं, “यह एक सुपरफ़ूड है, जिसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं, लेकिन भारत में तो यह इतने महंगें मिलते हैं कि आम आदमी इसे खरीद भी नहीं पाते। यहां इसे ज्यादा लोग जानते भी नहीं और न ही इसकी खेती होती है।”

कैसे आया खेती से जुड़ने का ख्याल?

एवोकाडो की खेती से जुड़ने के पहले, हर्षित ने इज़राइल जाकर इसे उगाने की बकायदा ट्रेनिंग ली है। दरअसल, हुआ यूं कि एक बार एवोकाडो खाते समय उनकी नज़र इसके पैकेट पर पड़ी, जहां उन्होंने पढ़ा कि इसे इजराइल में उगाया जाता है।

तभी उनके मन में यह सवाल आया कि एक गर्म देश होते हुए भी जब इसकी खेती इज़राइल में हो सकती है, तो भारत में क्यों नहीं?

वह बताते हैं, “मैंने इज़राइल में एवोकाडो की खेती करनेवाले किसानों का पता लगाया और इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए कई किसानों से बात भी की। आख़िरकार, मैंने एक महीना वहां रहकर खेती की सारी जानकारी लेने का फैसला किया।

साल 2017 में मेरे BBA का आखिरी सेमेस्टर चल रहा था, तभी मैंने खेती से जुड़ने का मन बना लिया था।” इसके बाद हर्षित ने भारत आकर अपने परिवारवालों को अपने आइडिया के बारे में बताया। उनके पास भोपाल में पारिवारिक ज़मीन भी है, इसलिए उन्हें परिवारवालों का पूरा सहयोग मिला।

कितना आया खर्च?

अब ज़मीन तो उनके पास थी, लेकिन पौधे और मिट्टी तैयार कैसे करें? इसके लिए उन्होंने इजराइल के अपने कुछ दोस्तों की मदद ली, जहाँ से उन्होंने खेती सीखी थी।

उनके इज़राइली सहयोगी ने ही भोपाल में ज़मीन तैयार करने से लेकर इजराइली एवोकाडो के मदर प्लांट मुहैया कराने का काम किया। उन्होंने बताया कि एवोकाडो की सबसे अच्छी किस्म के लिए भारत के दक्षिणी भाग का तापमान सही है। वहीं, भोपाल में लगने वाले पौधे, क्वालिटी में दूसरे नंबर पर हैं।

हर्षित बताते हैं, “साल 2019 में कुछ क़ानूनी प्रक्रिया के कारण मेरे पौधे भारत नहीं आ पाए थे और फिर कोरोना के कारण एक साल और काम रुक गया। पिछले साल जुलाई में मैंने इजराइल से 1800 पौधे मंगवाए। इन पौधों को करीब एक साल तक एक संतुलित वातावरण में रखना होता है, जिसके बाद अब मैं इन्हें अपने खेत में लगाने वाला हूँ।”

इसकी खेती के लिए उन्होंने पांच एकड़ खेत को ड्रिप इरिगेशन के साथ तैयार किया है। एक बार पौधे लगने के बाद, करीब तीन से चार साल बाद इसमें फल आने शुरू हो जाएंगे। उन्होंने इस पूरे सेटअप के लिए 40 लाख रुपये खर्च किए हैं।

सोशल मीडिया के जरिए शुरू किया नर्सरी का काम

जब से हर्षित एवोकाडो की खेती के बारे में रिसर्च कर रहे हैं, तब से उन्होंने अपने बारे में यूट्यूब और सोशल मीडिया के जरिए दूसरों को भी बताना शुरू किया है। इस तरह सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने उनकी खेती में रुचि दिखाना शुरू किया।

हर्षित कहते हैं, “कई लोगों ने मुझसे पौधों की मांग की, तो कुछ इसकी खेती के बारे में जानने के लिए संपर्क करते हैं। अब तो मैंने इजराइल से फिर से करीब 4000 पौधे मंगवाए हैं, जो मैं देशभर के किसानों को बेचने वाला हूँ।”

उनके पास 4000 पौधे की लगभग 90 प्रतिशत तक की बुकिंग हो गई है, जो गुजरात, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र सहित कई और राज्यों के किसानों ने ख़रीदे हैं। इस तरह यह नर्सरी भी उनकी कमाई का नया ज़रिया बन गई है।

[ डि‍सक्‍लेमर: यह न्‍यूज वेबसाइट से म‍िली जानकार‍ियों के आधार पर बनाई गई है. Lok mantra से इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है.]

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